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काली रात

kali raat

कुमार विक्रमादित्य

और अधिककुमार विक्रमादित्य

    तमस के गलियारे में ऊँघता

    एक हताश आदमी

    जोहता एक बाट

    निकल जाने को

    धुंध से

    पर लाचार

    कि धुंध के उस पार भी

    धुंध ही है

    कल तक जिसे अपना समझ

    करता रहा रखवाली

    वह कुछ नहीं था

    सिवाय भ्रम के

    बिफर गए स्वामी

    भूल गए सभी करार

    जो उसने किए थे अपने उसी मुख से

    गुस्ताखी यहीं थी कि

    हाँ में हाँ नहीं मिलाया था उसने

    सोचा था इतनी घनिष्ठता

    आरे नहीं आएगी

    अपनी बात को अच्छे से रखने के लिए

    मगर वह भूल बैठा कि

    उन्हें हमसे नहीं

    हमारे किए हुए चाकरी से प्रेम था

    उन्हें प्रेम था

    मालिक के दिन को दिन और

    रात के रात कहने से

    उन्हें प्रेम था

    मालिक के जूठन को

    प्रसाद समझ ग्रहण करने से

    उन्हें प्रेम था मालिक के लिए अपने

    प्राण को न्योछावर करने से

    उन्हें प्रेम था मालिक के

    कहे वचन को ब्रह्म वाक्य

    समझने का

    हाय रे भाग्य विधाता!

    किसी को अपने धन का गुमान है

    तो किसी को अपने

    किए कर्म के बदले

    प्रश्न का भी अधिकार नहीं।

    स्रोत :
    • रचनाकार : कुमार विक्रमादित्य
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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