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काला लिबास अँधेरे का

kala libas andhere ka

सुमन शेखर

सुमन शेखर

काला लिबास अँधेरे का

सुमन शेखर

और अधिकसुमन शेखर

    अँधेरा इतना ज़्यादा था

    जैसे रौशनी को बुहारकर कोने-कोने से

    बाहर बिठा दिया गया हो दरवाज़ा पर

    रौशनी, जो अंदर आने को इतना आतुर थी

    कि दरवाज़े के छोटे से ओट से

    बड़ा-सा होकर फैल जाना चाहती थी भीतर

    काला रंग इतना गाढ़ा काला था

    कि सफ़ेद रौशनी आते ही भभक कर चमक उठा

    काला सफ़ेद का खेल चलता रहा

    एक ने पूरी जगह दी

    दूसरी ने जगह बनाने में कसर छोड़ी

    लंबे इंतज़ार के बाद भी जब ‘ओट’

    ‘खुले दरवाज़े’ में नहीं खुला

    रौशनी ने झुँझलाकर सूरज बुझा दी अपनी उपस्थिति

    अंदर-बाहर एक रंग एक लिबास हो गया

    रात गहरी हो गई

    पुरखे कह गए हैं—

    रात लंबी नहीं होती

    कुछ भी हमेशा के लिए नहीं रह जाता।

    स्रोत :
    • रचनाकार : सुमन शेखर
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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