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कल और आज

kal aur aaj

शिवांगी सौम्या

और अधिकशिवांगी सौम्या

    आज कई महीनों बाद आई घर

    कई सालों बाद गई मार्केट

    देखा आपकी दुकान

    जहाँ आप अब कभी नहीं होंगे।

    देखा बंसी दादा की दुकान

    जो अब उनका बेटा चलाता है

    जहाँ सन्नाटा पसरा होता था

    वहाँ अब भीड़ है

    अब वहाँ दादा नहीं हैं कि रोक के

    इंग्लिश में बोलेंगे,

    पोयम रिसाइट करवाएँगे,

    या पूछेंगे जीके के सवाल

    और मैं खोजती रहूँ तरकीब

    बचकर निकल जाने की

    दुकान के अंदर से अब नहीं झाँकेगी सलोनी

    अपने टॉय ब्लॉक के साथ

    क्योंकि अब वह वहाँ नहीं रहती है

    मेरी तरह!

    संतोष अंकल की दुकान

    जहाँ लगी होती थी आपके दोस्तों की मंडली

    अब बस वहाँ ग्राहक होते हैं

    उनमें से कई आपके पीछे चले गए

    और उनकी छत जहां नये साल पर होती थी मुर्गा पार्टी

    अब वह खाली रहता है।

    थोड़ी दूर और बढ़ी तो देखा

    अमरेंद्र अंकल के होम्योपैथी की दुकान

    अब वहाँ एक भूंजे की दुकान है

    अब हम किसी और डॉक्टर के पास जाना होता है

    वहाँ कोई नहीं कहता हाथ निकलने को

    और देता उजली गोलियों वाला

    दुनिया का सबसे सुंदर प्रसाद

    जब हम कहते हम बच्चे नहीं रहे

    अमरेंद्र अंकल कहते हमारे लिए तो हमेशा रहोगे

    इस नए डॉक्टर के लिए हम बड़े हैं

    जो हम हमेशा से होना चाहते थे।

    लौट के आई तो नजर पड़ी

    घर के आगे की किराने की दुकान पर

    अब नहीं है वहां सिक्स पैक वाला शिवनंदन बूढ़ा

    अब कोई नहीं गाता

    आने-जाने वाली लड़कियों के लिए गाना

    अब वो आराम से रास्ता पार करती है

    और कोई नहीं करता एक-एक पैसे के लिए

    आख़िरी दम तक लड़ाई।

    उनकी दुकान के आगे की चौकी

    जिसे वह सजा रखे होते हैं,

    होते थे हर वैरायटी के बिस्किट और केक

    वह अब खाली रहती है।

    अब वहाँ होती है

    आस-पास के विधवा और विधुर की मंडली

    जिनमें से किसी के पास नहीं होता

    सिक्स पैक एब्स

    होता है तो झुकी कमर,

    चटकते घुटने,

    दुखते पैर,

    उजले बाल,

    और चेहरे पर जीवन की थमी लहरें

    यहाँ छोटी की दादी रहती है,

    जिनके पति शादी के कुछ साल बाद ही चल बसे

    और नन्ही की दादी जो चलती है दादा की छोड़ी हुई लाठी के साथ

    जैसे वह उनका हाथ अब तक पकड़ के हों।

    और है मगही दादा जिनकी पत्नी पिछले साल ही चल बसी

    जिन्हें कमरे से निकाल कर चौखट पर छोड़ दिया गया है

    जहाँ वह एक खाट पर सोते हैं

    अब खाट ही उनका कमरा है

    उनका कहना है कि उन्हें अब कमरे की ज़रूरत नहीं

    और हैं मन्नू दादा जिनकी बीवी इस साल नहीं रहीं

    उनकी लाठी मज़बूत है

    उनका कमरा अभी उनका है

    फिर भी जब भी चौकी की तरफ़ नज़र घुमाओ

    वे वहाँ मिल जाते हैं।

    ये लोग बैठते हैं

    सिक्स पैक वाली शिवनंदन बूढ़े के लगभग टूटी चौकी पर

    और इस मंडली में शामिल में जाते हैं

    इन लोगों का अब कोई है

    अपने-अपने दुखों के साथ

    अपने-अपने दुखों में

    एक-दूसरे का दुख बाँटने के लिए।

    पापा,

    मम्मी भी अब इनके साथ बैठती है

    जब तक भाई कॉलेज से नहीं आता

    और मैं छुट्टियों में।

    तब तक,

    जब तक हमलोग आपके द्वारा खाली किए गए घर को

    भर नहीं देते।

    स्रोत :
    • रचनाकार : शिवांगी सौम्या
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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