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कहाँ अब नेह बचल बा

kahan ab neh bachal ba

कृष्णानन्द कृष्ण

कृष्णानन्द कृष्ण

कहाँ अब नेह बचल बा

कृष्णानन्द कृष्ण

और अधिककृष्णानन्द कृष्ण

    अपना-अपनी के खाली सब सोच रहल बा

    मुँहजोरन के खूब कटत बा इहँवा चानी

    मानवता का अरथी के सभ नोच रहल बा

    जे शरीफ बा, ओकर लोग उतारत पानी।

    देखीं भाई समय भयावह आइल कइसन

    मारा-मारी देखीं चारो ओर मचल बा

    एक दूजे के लोग करत बा अइसन-तइसन

    बैर भाव बा बढ़ल, कहाँ अब नेह बचल बा।

    अइसन मोका फेर कबो ना हाथे आई

    लूट-लूट के आपन खाली झोली भर लीं

    धोई हाथ बहत गंगा में आपन भाई

    भोरे-भोरे राम नाम के चन्दन कर लीं

    मुँह में राम बगल में छुड़ी राखी हरदम

    रही लूट के घर ले आके हरदम, बमबम।

    स्रोत :
    • पुस्तक : आपन गाँव भेंटाते नइखे (पृष्ठ 50)
    • रचनाकार : कृष्णानन्द कृष्ण
    • प्रकाशन : पुनः प्रकाशन, पटना
    • संस्करण : 2012

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