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का खा के रउआ के पाइब जी!

ka kha ke raua ke paib jee!

प्रकाश उदय

प्रकाश उदय

का खा के रउआ के पाइब जी!

प्रकाश उदय

और अधिकप्रकाश उदय

    चउकट के बहरिए से भिखार

    हाथ पसार, दाँत चिआर

    लगवलस हाँक बरियार—

    “एक मुट्ठी मिल जाए सरकार!

    भीतरे

    गँवे केहू से कहत रहन घर के मलिकार—

    लाख के नीचे ना पहिआई बियाह के बवाल

    फिरीज टीवी चाहीं उपरवार

    होखे सावँग लीं करार

    ना जाईं, हमरा कवन दरकार!”

    सुन के,

    काहे दो भिखरा लजा गइल

    अपने में समेटा गइल

    कहऽ भला, एगो हम बानी साला

    छछनींला, खखनींला, हहरींला माँगींला

    एगो बा साला

    माँगतो बा, उतरातो बा, गुरनातो बा, बघुआतो बा!

    ईहे नू कहाला

    अनपढ़ गँवार

    पढ़ल-लिखल समझदार!

    आछा, रहऽ रहऽ

    भइल नू होस

    जाग गइल जोस—

    अरे स्साला एह बिल्डांग वाला

    सुनाता कि ना?

    ले आव नगद आठ आना

    खिआव हमरा के

    बान्ह दे मउगी खाती छाना

    नाज दे बीन-चुन के एक कटोरा

    नन्हका खाती लकठो दे एक खदोना।

    सुनके, लाल-लाल आँख कइले

    फुनुर-फुनुर नाक कइले

    धावल आइल मलिकवा के पूता

    धरवलस सट्-सट् पाँच जूता।

    भिखरा के नीन टूटल

    कसहूँ-कसहूँ छूटल

    दूनों हाथ जूटल

    मुँह से अँटक-अँटक के बोल फूटल—

    सरकार,

    सलामत रहे राउर कोठी

    राउर फाटक

    नकली भिखार

    ना करे पावल

    असली के नाटक

    एह बूढ़ बलाय के जनि दीं धाका

    बनल रहे राउर एलाका

    रउआ माँगल करीं

    घर में बोला-बोला के

    हमहूँ माँगब

    दुआरे-दुआरे पोंछ डोला-डोला के

    का खा के रउआ के पाइब जी

    रउआ मलिकारे

    हम भिखारे कहाइब जी!

    स्रोत :
    • पुस्तक : बेटी मरे त मरे कुँआर [भोजपुरी कविता-संग्रह] (पृष्ठ 9)
    • रचनाकार : प्रकाश उदय
    • प्रकाशन : कौशल्या प्रकाशन, आरा
    • संस्करण : 1988

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