इस तरह मुक़दमे चले

चंद्रकांत देवताले

इस तरह मुक़दमे चले

चंद्रकांत देवताले

और अधिकचंद्रकांत देवताले

    तहस-नहस और भयाक्रांत हो चुकी

    भाषा के बाहर भी बची हुई थीं भाषाएँ

    और सहमे-दुबके गिरे पड़े लोगों में भी

    मौजूद थे छिपे हुए जो यक़ीन रखते थे

    बची हुई मनुष्यता में

    और जज़्बे के साथ साहस भी था कुछ में

    वे ही आगे आए गवाही के वास्ते

    लेकिन लफड़े थे

    पुरावे के लिए आवश्यक खानापूर्तियों में

    कई ख़ामियाँ थीं

    दर्ज किया गया समय भी मेल नहीं खाता था

    हाहाकार इतना था समूचे वृत्तांत में

    कि तथ्यों के लिए साँस लेने तक की जगह नहीं थी

    इसी बिना पर खदेड़ दिए गए कई

    और कुछ जो पुलिस वालों की भाषा में

    ज़्यादा निकल रहे थे बाहर

    अंदर कर दिए गए फ़र्ज़ी गवाही के आरोप में

    फिर भी खड़े थे

    कातर और पैनी चीत्कारों की परछाइयों

    और मौत के मंज़रों का बोझ लिए

    बिखरने-मिटने नहीं दे रहे थे

    हत्यारों के चेहरों-नामों को

    अपनी आँखों और याददाश्त से

    अव्वल तो पुलिस ने ही कमज़ोर बना कर

    पेश किया मामलों को

    दूसरी तरफ़ गिर पर्वत के शेर की तरह

    गवाहों पर दहाड़ते रहे सरकारी वकील

    उन्हें भावुक कभी स्मृतिविहीन पागल

    तो कभी भाड़े के कहकर लताड़ा गया

    कुछ गवाह बेहद ग़ुस्से में थे

    और एक के बाद दूसरे हत्यारों के नाम

    गिनाए जा रहे थे

    वे अदालत से निकलने के बाद

    दुबारा नहीं देखे गए इलाक़े में

    कुछ हत्यारे जिन्हें कम-से-कम पाँच बार

    मौत की सज़ा हो सकती थी

    गवाहों की मदद और हिफ़ाज़त के लिए

    इस क़दर आगे आए कि गवाह

    टूट गए और अपने नए बयान में

    उन्हें कहना पड़ा

    कि अँधेरे और धुएँ में वे

    कुछ नहीं देख पाए

    इस तरह मुक़दमे चले

    जिनमें सैकड़ों को बाइज़्ज़त बरी कर दिया गया

    कुछ तो इतने अधिक निर्दोष पाए गए

    कि उन्हें निगमों-आयोगों और बैंकों के

    अध्यक्ष, संचालक सदस्य इत्यादि बनाकर

    सम्मानित करना मजबूरी हो गई

    दो-चार सरेआम प्रतिष्ठित हत्यारों को

    आजीवन कारावास जैसी सज़ा सुनाने के

    पेंच ज़रूरी फँस गए

    जिसके लिए बाद में अलग से

    ख़ास अदालत बैठी और कहा गया

    दरअसल, वे अपराधी नहीं हथियारबंद शांति-सैनिक थे

    सद्भावना-मार्च की व्यवस्था में जुटे

    इसके बाद भी न्याय हुआ

    तोड़-फोड़ आगज़नी के आरोप में

    कुछ लोगों पर ज़ुर्माना ठोंका गया

    जिसकी भरपाई राहत-फंड से कर

    उन्हें भी छुट्टा छोड़ दिया गया

    फिर जज का तबादला हो गया

    बाद में ख़ुद सरकार ने भंग कर दिया अपने को

    सिंहासनों रथों से उतरकर हत्यारे सड़क पर गए

    और जो सड़क पर थे

    वे अंधेरिया मोड़ की झाड़ियों के उस तरफ़ खिसक गए

    स्याह दिनों में इस तरह मुक़दमे चले।

    स्रोत :
    • पुस्तक : जहाँ थोड़ा-सा सूर्योदय होगा (पृष्ठ 241)
    • रचनाकार : चंद्रकांत देवताले
    • प्रकाशन : संवाद प्रकाशन
    • संस्करण : 2008

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