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जोड़ो भरि हाथ

joDo bhari haath

बिभा विमर्श

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जोड़ो भरि हाथ

बिभा विमर्श

और अधिकबिभा विमर्श

    कहियो काल

    हारि जाइत छी अपनहि जिद्दसँ

    भीजि जाइत अछि नोरसँ आँखिक कोर

    हम भऽ जाइत छी बताहि सन, ठीके

    नहि हारलहुँ

    कहियो अपन प्रतिद्वन्द्वीसँ

    निकलैत रहलहुँ जिनगीक रेसमे

    सभदिन सभसँ आगू, बहुत आगू...

    मुदा आब

    बैरिन भेल अछि हमर हृदय

    जाहिमे हम संजोगने छी

    किछु सिनेहक ताग

    जकर कोमल बन्हन संग

    चलैत अछि हमर धुकधुकी,

    बाँचल अछि प्राण

    कखनो काल

    डरा जाइत छी अपनहि छाँहीसँ—

    कतहु धकेलि तँ नहि देत

    आकि बंद तँ ने कऽ देत हमरा

    ओहि अन्हार कोठरीमे

    जतयसँ पड़ायल छलहुँ हम

    बहुत रास घाव फुटलाहा कपार लेने

    जकर सोनित

    जमिकऽ भऽ गेल छल कारी स्याह

    मुदा आँखिक आगू अनचोके

    भेल इजोरियामे देखैत छी एकटा हाथ

    ओहि हाथमे भीजल रुमाल

    जाहिमे लागल कारी स्याह भेल सोनित

    फेर हम

    भऽ उठैत छी चिंतामुक्त,

    संघर्षरत डेग चलि पड़ैत अछि निडर—

    जोड़ो भरि हाथक सबलताकेँ निहारैत...!

    स्रोत :
    • पुस्तक : नहि सीता नहि (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 53)
    • रचनाकार : बिभा विमर्श
    • प्रकाशन : नवारम्भ, पटना/मधुबनी
    • संस्करण : 2023

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