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जो हमेशा है, वह डरावना है

jo hamesha hai, wo Daravna hai

सुमन शेखर

सुमन शेखर

जो हमेशा है, वह डरावना है

सुमन शेखर

और अधिकसुमन शेखर

    सत्य का सबसे अधिक विरोध वही करता है

    जो सत्य से बहुत दूर खड़ा हो

    या वश मे हो किसी ख़ूबसूरती के

    जिसे रोने की आदत लग गई

    उसे कंधे की आदत बहुत पहले लग चुकी है

    वह एक दिन सुबह उठता है

    आँख पर पट्टी बाँध बाहर चला जाता है

    वापसी में, वह अपना घर भूलने की कोशिश करता है

    ताकि पूरी तरह थकना जान पाए

    मेरे पिता एक लंबे समय से लापता हैं

    हर शाम उनको ढूँढने निकलता हूँ

    खाली हाथ जाता हुआ,

    खाली-खाली लौट आता हूँ

    सुबह फिर से आँखों में

    पिता के होने के सपने भरे होते हैं

    आख़िर किस वजह से किसी कवि ने कहा होगा—

    “कवि को वह गाने दो, जो वह गाना चाहता है”

    दुनिया का सारा लेखन

    कल्पना के लेप से रंगा है

    इमारत भव्य है, नींव झिलमिल

    अपनी ग़लतियों को

    कविता की शक्ल देकर सुधारा नहीं जा सकता

    महान, जाने हुए लेखकों को पढ़ा,

    सारे भ्रम टूटे

    ख़ुद की हार और नाकामियों तले

    ख़ुद को कितना ज़्यादा सहानुभूति परक लिखा जा सकता है!

    ऐसे महान, जाने हुए कवि ने

    उस बुराई को कहीं भी दर्ज़ नहीं किया,

    जिसमे वह ख़ुद संलिप्त रहे

    ऐसे महान, जाने हुए कवि ने

    उसकी जगह भी ख़ुद को रखकर लिखा,

    जो उसकी दी हुई पीड़ा का बोझ ढो रहे थे

    ऐसे महान, जाने हुए कवि ने ऐसा भी लिखा

    जिस पर उसने अमल किया

    लेकिन उसे पता था

    यहाँ ‘वाह’ और ‘आह’ के साथ ‘सम्मान’ की गारंटी है,

    तब जाना संदेह और स्मृति एक सीमा पर कितने सौतेले हैं।

    स्रोत :
    • रचनाकार : सुमन शेखर
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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