के कहलक सुरूज मरैछ नहि!
अपन शाश्वत संघर्षमे
शक्ति संचय लेल
पुनर्जीवित भऽ घनघोर युद्ध
ठनबाक लेल
प्रत्येक दिन सुरूज
अन्हारकेँ सत्ता-साम्राज्य
सौपैत अपन अवसान
स्वीकार करैछ;
मुदा, हमरा लोकनि की करैत छी?
कतय जाइत छी?
प्रत्येक दोसर दिन
अपन अभियानमे नव ऊर्जाक संग
फेर ठाढ़ भेल सूर्यकेँ देखि
हमरा कहियो, कदाचितो
अपन नपुंसकताक बोध नहि होइछ!
हम जीबाक मात्र कामना करैत छी
यथास्थितिवादी भऽ
संघर्ष हमर ईष्ट नहि, ध्येय नहि
सभ दिन, सभ क्षण, नीक-अधलाहमे
बरखा-बसातमे
हम मरितो नहि मरैत छी
कारण मरबाक कोनो टा कामना
नहि होइछ हमर मोन-प्राणमे
मोन-प्राणमे टांगल रहैछ सदिखन
जीवन-कामनका डोरि
लाल-पीयर सूत-ताग
हमरा नहि चाहि शक्ति, नहि चाही पुनर्जीवन,
पसरल रहय दिऔक
मोन-प्राणमे
अपन लहास उघबाक कामना।
जरथु मरथु बरू
दैदीप्यमान भास्कर!
- पुस्तक : ई-मिथिला
- संपादक : बालमुकुन्द
- रचनाकार : ललितेश मिश्र
- संस्करण : 2020
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