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जीबा लेल अभिशप्त छी शहर

jiba lel abhishapt chhi shahr

बिभा विमर्श

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जीबा लेल अभिशप्त छी शहर

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    (1)

    अस्तित्वक ताकमे हम

    बहरा गेल छलहुँ अपन गामसँ

    आँखि भरि लऽ कऽ स्वप्नक पेटारी

    देखैत छलहुँ सूतल-जागल

    बस वएह टा स्वप्न

    अबैत काल

    देने रहथि बड़की काकी

    एकटा पुरनका गमछीमे बान्हिकऽ

    फेट्टा चिक्कसक सोहारी,

    बुकलाहा नून-मिरचाइ

    बहुत समय बीति गेल तकर

    ओझरा लेलक महानगर हमरा

    हम हेरा गेलहुँ तकरे चकचोन्हीमे

    (2)

    मुदा हमरा हृदयमे

    अखनो जीवंत छल गाम

    जाहिमे तकैत रहैत छलहुँ

    अपन बाल्यकाल, जे

    युग बितलाक बादो

    बीतल सन नहि लगैत अछि एखनो

    फुलही बाटीमे

    घोरल पियरका रंग, जाहिमे

    राखल गेल छैक जनउ, जे

    भीजिकऽ भऽ गेल छैक आर पीयर

    ओहि रंगकेँ दूरेसँ

    देखि रहल छी हम,

    मोने-मोन भऽ रहल छी तिरपित

    लगैत अछि जेना आँगनमे

    आबि गेल होअय पियरगर रौद

    हे देखियौ

    कनियें कालमे औथिन ननूदाइ

    ठोकथिन खुटरी

    फेर सोटथिन जनउ, जकरा

    दौड़ि-दौड़िकऽ बान्हब हम सभ

    फेर तँ भेटि जायत हमरा सभकेँ

    समतोलिया चाकलेट, जकरा

    बन्हने छथि ननुदाइ अपन आँचरक खूटमे

    (3)

    भोरे-भोर

    सुना पड़ैत अछि

    बाबा पएरक खड़ाम

    देखा पड़ैत अछि

    हाथमे रंग-रंगक फूलसँ

    भरल हुनकर फुलडाली

    आब जेना

    आँगनसँ भगवती घर धरि

    सहमि गेल अछि सभ

    मुदा नहि जँ सहमल छी, तँ हम

    जे दौड़िकऽ जायब,

    बाबा हाथक फुलडाली

    लऽ ढुकि जायब भगवती घर

    फेर कऽल जोड़ि बैसि रहब

    हुनकर सोझाँ संच-मंच

    देखैत रहब पूजा—

    मने-मन सपनाइत

    कि कखन भेटत

    भगवतीक आगूक राखल नैवेद्य

    हम सुनैत छी—

    भोरहरिया रातिमे

    उठैत झमटगर पराती

    जकर टहंकार सुनि

    उठि जाइत होयताह

    मन्दिरक भगवाने टा नहि

    दूर-दूर धरिक देव-पितर समेत

    खुट्टाक माल-जाल, चिड़ै-चुनमुन, सभ

    (4)

    किछुए मास पूर्व

    बड्ड झकझोरलक मोन

    नहि रहल गेल तँ

    विदा भऽ गेलहुँ गाम

    जाइत काल मैगडोनल्ससँ

    बटखर्चा लेल पैक करयलहुँ

    पिज्जा बड़गर

    कि तखन मोन पड़ल

    फेट्टा चिक्कसक सोहारी

    बुकलाहा नून-मिरचाइ...

    से हम मोने-मोन

    भऽ गेल छलहुँ लज्जित

    कि कतेक बदलि गेल हमर मोन

    मुदा जखन

    पहुँचलहुँ गाम तँ लागल जेना

    कतहु भुतिया तँ नहि गेलहुँ

    एहन तँ नहि रहय हमर गाम

    तखने कान धरि पहुँचल

    झोलफल आँखि संग

    एक अदृश्य कम्पित स्वर, जे

    ताकि रहल छल जेना

    कत्ता बरिससँ घुरबाक हमर बाट

    जेना

    निछोहे बाजि रहल रहथि

    कि आब बदलि गेल सभ किछु

    नहि बचल पूजा, आकि

    तकर नैवेद्य लेल बैसल

    बाबा आगू पोता-पोतीक मोन

    जनउ के बनाओत

    फुलहा बाटिओ अलोपित भऽ गेल

    उठि गेल झमटगर परातीक स्वर

    जे बाजि रहल छल

    आन क्यो नहि, समय छल

    जे हमरे समक्ष हमरा खौंझा रहल छल

    इएह सभ सोचैत

    तथापि किछु नहि सोचैत

    हम घुरि अयलहुँ

    अपन गामसँ अपन शहर

    आबसँ हम

    हृदयहीन बनल

    जीबा लेल अभिशप्त छी शहर!

    स्रोत :
    • पुस्तक : नहि सीता नहि (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 22)
    • रचनाकार : बिभा विमर्श
    • प्रकाशन : नवारम्भ, पटना/मधुबनी
    • संस्करण : 2023

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