Font by Mehr Nastaliq Web

झंझावात

jhanjhavat

आग्नैश नैमैश नॉज

अन्य

अन्य

और अधिकआग्नैश नैमैश नॉज

    एक क़मीज़ उड़ी जा रही है घास के मैदान में।

    गर्मी के अंधड़ में

    छिटकी अलगनी से,

    और लड़खड़ाती अब, जून की हरी घास पर—

    घायल सिपाही का

    देहहीन नर्तन।

    और लो ये भी उड़ चले। कैनवस

    बिजली की गरज-तरज-गोलाबारी में

    आख़िरी फ़ौजी अभियान;

    उड़ चले—

    छिटके अलगनी से, बोरे,

    तिकोन पाल, चीथड़े, पताकाएँ,

    अंतहीन हरे-भरे खेत में

    गिरते-पड़ते, हिचकोले लेते

    सामूहिक क़ब्र के

    आख़िरी कैनवस।

    निश्चल ही, बाहर निकलती हूँ

    अपनी काया की परिधि-रेख से बाहर,

    कदाचित कुछ अधिक पारदर्शी एक धावक,

    उन्हीं के बीच, उनके पीछे-पीछे

    तनी हुई देह,

    मानो एक अधपगली—उड़ गया जिसका पखेरू,

    मानो एक पेड़—उड़ गए जिसके पखेरू,

    सो, टेरा जा रहा उन्हें, बाँह फैलाकर—

    गिरे वे औंधे मुँह अब।

    और अब धवल-पंख झटके से

    पूरी की पूरी सेना उड़ चली ऊँचे,

    ऊँचे और ऊँचे जैसे गतिविहीन आकृतियाँ,

    ऊँचे और ऊँचे जैसे सशरीर पुनरुत्थान,

    जल के भीतर से—

    मानो तमंचे के खटके से—

    हो आविर्भाव

    अनंत का।

    उनके बाद नहीं शेष कुछ, खेत में,

    बस एक इंगित पुकार का

    और घास का गहरा हरा रंग। झील।

    स्रोत :
    • पुस्तक : दस आधुनिक हंगारी कवि (पृष्ठ 65)
    • रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक गिरधर राठी, मारगित कोवैश
    • प्रकाशन : वाग्देवी प्रकाशन
    • संस्करण : 2017

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY