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जँ अहाँ सोझाँ अबै छी

jan ahan sojhan abai chhi

बुद्धिनाथ झा

बुद्धिनाथ झा

जँ अहाँ सोझाँ अबै छी

बुद्धिनाथ झा

और अधिकबुद्धिनाथ झा

    (1)

    जँ अहाँ सोझाँ अबै छी

    जानि नञि हम की पबै छी।

    की कहू, कतेक रचना

    अंकमे सटने रहै छी॥

    रोममे गाँथल अहाँ के

    भय अनिश्चितता भविष्यक

    देल दैनन्दिन बनल अछि

    सहस शुक्राचार्य शिष्यक।

    राम जँ पेटे डेङओता

    के मेटाओत कालिमा के

    दुष्ट रक्तप ग्रास दिनकर

    के छीनत शुचि लालिमा के।

    जानि नञि कतेक कुण्ठा

    गड़ि रहल अछि शूल सन

    तञो तुरत हँसि दैत छी हम

    ऋतु वसन्तक फूल सन॥

    (2)

    छी अहाँ चलि जाइत कतहु

    लीखित वा मौखिक देबऽ ले

    जानि नञि के-के अबैत अछि

    जानि नञि की-की लेबऽ ले।

    ठाढ़ चानन भाल जिनकर

    गोमुखीमे माल होइत अछि

    जे कोनो उधवा उठै छै

    सबमे हाथ होइत अछि।

    के पढ़ल, के मूर्ख, के अछि

    नीक अथवा बदचलन अछि

    के स्वजाति के सुजाती

    के स्वजन वा के सुजन अछि।

    हे जहाजक उड़ल पंछी

    जा ने घुरि आबैत छी

    ता सतत कँपिते रहै छी

    वृन्त परहुक फूल सन॥

    (3)

    शरद् ऋतु के स्वच्छ नभमे

    केहन पूनम चान होइ छै

    ठाढ़िअहु जँ फूटय मज्जर

    गाछ लुधकल आम होइ छै।

    कि हेतै जँ स्वयं चातक

    लुब्ध हो कामी प्रवासक

    मोन सम्पय फर अछइत

    आस अघवृत्तिक अकासक।

    जनै छी जे जनक जिनकर

    स्वयं श्री उड्डीश छथि

    तञे ने कर्त्तव्यक नियामक

    पुत्र गणपति ईश छथि।

    होइछ संशय हएब सोझाँ

    बेर पर झरि पायब कि

    तँ सतत झरिते रहै छी

    वात शापित फूल सन॥

    (4)

    जन्म जन्मक पुण्य बल वश

    क्लेश भंजक राम अओता

    तीर लओता, धनुष लओता

    चरण रज मम धाम लओता।

    पतित नरपति केर कुकृत्यँ

    हम पाथर बात लाजक

    जँ प्रतीक्षा रामहिक हो

    तँ अहल्या कोन काजक।

    के लगाओत जा तमाचा

    क्रूर कालक गाल पर

    के लगाओत लाल टीका

    भव्य भारत भाल पर।

    देश सुन्दर भारतक

    सीमान्त अघकाल अछि

    हम बुझै छी अइ शती के

    आइ अन्तिम साल अछि।

    गगन पथ रथ बैसि दिनकर

    भमथु भल शार्दूल वत्

    हम सतत झरिते रहब प्रभु

    वह्नि व्यापित फूल सन॥

    जँ अहाँ सोझाँ अबै छी

    जानि नञि हम की पबै छी।

    जानि नञि कतेक कुण्ठा

    गड़ि रहल अछि शूल सन

    तञो तुरत हँसि दैत छी हम

    ऋतु वसन्तक फूल सन॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : अक्षर निर्क्षर (मैथिली काव्य-संग्रह) (पृष्ठ 26)
    • रचनाकार : बुद्धिनाथ झा
    • प्रकाशन : क्रिएटिव कैम्पस प्रकाशन, हैदराबाद
    • संस्करण : 2015

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