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जैसी होनी चाहिए मेरी शा'इरी

jaisi honi chahiye meri shaa iri

अनुवाद : सुरेश सलिल

कामिमुरा हाजिमे

कामिमुरा हाजिमे

जैसी होनी चाहिए मेरी शा'इरी

कामिमुरा हाजिमे

और अधिककामिमुरा हाजिमे

    अगर तुम किसी पहाड़ी के पास रहते हो तो

    तुम्हारे रिहायशी कमरे में मेंढक फुदकते रहते होंगे

    और कोई कठफोड़ा दीवारघड़ी पर आसन जमा

    छेड़ देता होगा चिर्र्-चिर्र् की टेक

    एक व्याध पतिंगा

    अभी-अभी तुम्हारे घर से होकर गुज़रा है

    मैं यहाँ महज़ पैंट पहने बैठा

    यह कविता लिख रहा हूँ,

    क़लम को मज़बूती से पकड़े

    सुडौल हों वाली लिखावट में

    क़लमबंद कर रहा हूँ अपनी रोज़मर्रा ज़िंदगी का तौर-तरीक़ा

    जब मुझे आसपास के लोगों

    या दुनिया-जहान से कोई शिकायत होती है

    जब मैं अपने अंदर नफ़रत या असंतोष महसूस करता हूँ

    तो इसका साफ़ मतलब है

    कि मुझे अभी भी

    अपनी ख़ुद की ज़िंदगी के तौर-तरीक़े से तसल्ली नहीं है

    आदमी की अपनी ख़ुद की ख़ुशी और रंज

    हवा के उस झोंके की तरह हैं

    जो व्याध-पतिंगा को दूर भगाता है

    मैं अपनी मेज़ पर इस तरह झुका बैठा

    और ज़्यादा माकूल समझदारी

    हासिल कर सकने की कोशिश में हूँ।

    स्रोत :
    • पुस्तक : रोशनी की खिड़कियाँ (पृष्ठ 246)
    • रचनाकार : कामिमुरा हाजिमे
    • प्रकाशन : मेधा बुक्स
    • संस्करण : 2003

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