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जैसे उतरा सरग से हमार गउआ

jaise utra sarag se hamar gaua

परवाना प्रतापगढ़ी

परवाना प्रतापगढ़ी

जैसे उतरा सरग से हमार गउआ

परवाना प्रतापगढ़ी

और अधिकपरवाना प्रतापगढ़ी

    जैसे उतरा सरग से हमार गँउआ,

    करै दिन भै हजारन सिंगार गँउआ,

    बोलै सबै केहु पिरितिया कै बोली,

    रँग- रँग कै खेल सब खेलैं हम जोली,

    मोरे सपनन कै सारा संसार गँउआ

    जैसे उतरा सरग से...

    सरसों के फुलवा पे खेलै चिरइया,

    भँवरा जौ गावैं फुलाय अमरइया,

    बाटै जियरा से हमरे पियार गँउआ

    जैसे उतरा सरग से...

    मनवा मगन होय नाचै किसनवा,

    खेतवा से घरवा का आवै जौ दनवा,

    गावै कजरी सोहर, मल्हार गँउआ

    जैसे उतरा सरग से...

    अम्बर से चन्दा अँजोरिया देखावै,

    धरती का हरी-हरी चुनरी ओढ़ावै,

    लागै चम्पा, चमेली, अनार गँउवा,

    जैसे उतरा सरग से...

    सगरौ डगरिया चमकै बिजुरिया,

    अस लागै डगरा भुलाय गै अँधेरिया,

    लागै दिल्ली कै मीना बजार गँउवा,

    जैसे उतरा सरग से...

    स्रोत :
    • पुस्तक : रस गागरी (पृष्ठ 24)
    • रचनाकार : परवाना प्रतापगढ़ी
    • प्रकाशन : अभिव्यक्ति संगम, साहित्यिक संस्था, लालगंज प्रतापगढ़
    • संस्करण : 2013

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