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इस तरह मत देखूँ तुम्हें कि

is tarah mat dekhun tumhein ki

सुशील कुमार

सुशील कुमार

इस तरह मत देखूँ तुम्हें कि

सुशील कुमार

और अधिकसुशील कुमार

    इस तरह मत देखूँ तुम्हें कि

    कि अनदिखा ही रह जाए तुम्हारा रूप-लावण्य

    अनछुआ ही रह जाए तुम्हारी आंतरिक बनक

    दबे ही रह जाएँ मन में हिलोरें लेते सपने

    और अनसुने ही रह जाएँ

    वहाँ जनमते प्रेम–गीत

    रूप-रस और गंध मात्र तो

    देखने-सुनने और स्पर्श के ढंग पर निर्भर है

    आँखों का दोष बस इतना है

    कि वह देखते हुए भी

    देख नहीं पाती तुम्हें अकस्मात पूरा-पूरा

    मन ही एकबारगी पढ़ पाता

    तुम्हारे रूप के आवरण-आकर्षण में गुप्त

    प्यार-सनी गहरी धँसी इच्छाओं की जटिल ज्यामितियाँ

    आँख से अधिक वह नज़र चाहिए मुझे

    तुम्हारे दीदार को

    कि जब देखूँ तुम्हें तो कुछ इस तरह देखूँ

    कि पूरा देखूँ, जैसे—

    किसान देखता है

    स्वेद-सिंचित धरती पर

    लहलहाते धान की बालियों के बीच

    अपनी पत्नी का खिला मुखड़ा

    जैसे मोर देखता है गर्व से

    धमाचौकड़ी करता मेघ भरा बादल

    जैसे मेहनती विद्यार्थी

    परीक्षा का अपना सफल रिपोर्ट–कार्ड

    देखता है हुलसकर

    और उसका मन बौराने लगता है

    प्रेम-हर्ष के तेज़ बयार में

    स्रोत :
    • रचनाकार : सुशील कुमार
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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