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एखनुक हाल

ekhnuk haal

चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

और अधिकचन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

    राजनीतिमे पाछाँसँ, मारी छिटकी सब ठाम,

    राजनीतिमे ककरो मुँह पर, लागि सकय लगाम।

    साहित्यक झाँखुड़मे कयलक, राजनीति पैसाड़,

    वनबिलाड़ सब जतय-ततय, कऽ रहल अपन बैसा।

    'बन्दौँ सन्त-असन्तन चरणा', तुलसी दास उवाच,

    सन्त अन्तिकामे छथि झोँकल, चलय असन्तक नाच।

    सैह नचै अछि बेसी जकरा, टाड़ा तीसी तेल,

    बाप गदहिया पूत ब्रह्मचारी तेँ कहबी भे।

    'लब्ध प्रतिष्ठित' लिखय तखन ने, कयलक बी. ए. पास,

    सकल अखरकट्टू अपनाकेँ, मानय तुलसीदास।

    विद्वत्ता शब्दक ज्ञान तेँ की? छथि तँ विद्वान,

    सरस्वती एहने डी.लिट्. पर, छथि पबैत सम्मान।

    कहबौता साहित्यकार आ, लिखता सबटा शुद्ध?

    तखन कोना विद्वत्समाजमे, बुझतनि लोक प्रबुद्ध?

    आबामे पाकत तखने सब, बुझतै माटिक बासन?

    कवि-लेखक लय कहू अहीँ, की व्याकरणक अनुशासन?

    सिद्धहस्त छथि, अपना लय अपने छथि शब्द गढ़ैत,

    पाठक नहि, छपला पर अपने छथि दस बेर पढ़ैत।

    स्वजन हेतु यदि नहि लिखता तँ प्रगतिशील कहबौता?

    अपन नाक कटबयबे करता, पंथक सङहि कटौता?

    अज नर, अजा बनलि नारीमे, आब रहल नहि अन्तर,

    नित्य दूरदर्शन पर ई, दुर्दर्शन होय निरन्तर।

    एक जुआनी आगि स्वयं, ताहू पर मटिया तेल,

    जे 'घृतकुम्भ समा' नारी, कहलनि से छला बलेल?

    उच्चासन पर बैसल कवि गण, रहथि नजरि खिरबैत

    कवितामे सुना रहल छथि 'अर्र चेहैत-चेहैत'!

    चेला-चाटी फहरा रहलनि, घर-घर कीर्त्तिक झण्डा,

    हिनकर कविता रानी पाड़थि, प्रतिदिन सोनक अण्डा।

    राजनीतिमे बाजि सकै छी, सबटा अगबे फूसि,

    कहय फूसिकेँ कतहु फूसि क्यौ, ली तकरे मुँह दूसि।

    सय-सय बेर फूसि बजला पर, सैह सत्य बनि जाय,

    राजनीतिमे जमबा लय अछि, फूसि अकाट्य उपाय।

    शुद्ध पितड़िया लोटा नेबो रससँ माँजल झकझक

    कहि सोनाक नाम बनियाँ, लाख लोककेँ ठकलक।

    स्रोत :
    • पुस्तक : चन्द्रनाथमिश्र ‘अमर’ रचना संचयन (पृष्ठ 387)
    • संपादक : योगानन्द झा, शम्भुनाथ झा, विजयदेव झा
    • रचनाकार : चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’
    • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2025

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