Font by Mehr Nastaliq Web

हम हेरै छी अपन मिथिला

hum herai chhi apan mithila

अशोक कुमार दत्त

अशोक कुमार दत्त

हम हेरै छी अपन मिथिला

अशोक कुमार दत्त

और अधिकअशोक कुमार दत्त

    सगरो परसल धुप्प अन्हरिया, नै बाट सुझय मतिमान यौ

    हम हेरै छी अपन मिथिला, राजा विदेहक शान यौ।

    'पाग' किनको शीश ने देखी, ने त्रिपुण्ड चन्दन

    नहि टीका, नहि अग्निहोत्र, नहि देखी संध्यावंदन

    विनु 'गायत्री-जप' कोना पायब, तीनू ताप सँ त्राण यौ।

    कुर्ता-धोती, डोपटा, नहि टीक, माथ शोभायामान

    जनेऊ मे कुंजी झुलैए, शौचो चढ़े नहि कान

    मिथिलाक्षर नहि, मैथिली बाजब, कत' मिथिलाक पहिचान यौ।

    पैर छूअब पहाड़ बनल, दूरहिं सँ छूबथि ठेहुना

    अढ़ेला पर हुनका घाम छुटन्हि, संगे जीवथि केउना

    जेठ बोली सुनि कान पकन्हि, अपना के बुझथि महान यौ।

    'बोआय-कट' केश कटा बेटी, घूमे गामे-गाम

    'मोबाइल' सँ दिन भरि 'चैट' करे, क' रहल नाम

    बाहरे अपने वियाहल कोना, बाप करौ 'कन्या-दान' यौ।

    केओ कनिआँ 'जीन्स-गंजी' मे, 'सिल्की हेयर' उधिएने

    केओ सलवार समीज पहिरने, बिनु दुपट्टा रखने

    अहिवाती अँचरा, नहि देखि कोना, 'खोइछ' भरब 'दूभि-धान' यौ।

    दुलहिनि हाथने लहठी-चूड़ी, स्वजन सँ नहि कोनो काज

    'झिझिया', 'छठि -गीत' नीक ने लागे, बजाबी 'म्यूजिक जाज'

    सोहागिनि सीत ने सेनुर देखी, कोना पूजब हनुमान यौ।

    बिनु फूल 'फुलहर' मे सीता, कोना करती 'गिरिजा-पूजन'

    'पुष्प-वाटिका' उजड़ल कोना होयत, 'राम-सिया' के दर्शन

    कतहु ने 'नचारी' गूँजैए, ने 'मधुश्रावणी'क गान यौ।

    नहि 'भित्ति-चित्र', नहि कनियाँ संग कोनो 'साँठ-उसार'

    गाम मे आब 'बैन' की देब, नहि 'दुरगमनिआ' भार

    नहि 'सौजनी', नहि 'पाथेय' होए ने 'समधि-मिलान' यौ।

    'बरेब 'क टाट ने देखी कतहु, ने भेटय 'देशी-पान'

    'डबरा-पोखरि' सभ भथायल, 'कुमही' तोड़ए तान

    'कोजागरा' मे आब कोना, बाँटब 'पान-मखान' यौ।

    अजोहे मे आम बिकायल, सुन्न मालदह गाछ

    सड़ल आन्ध्रा माछ सभ तरि, टटका नहि पोखरिक माछ

    बिनु 'तिलकोर', 'खम्हारू' कोना, करू पहुनाक सन्मान यौ।

    कोना 'भैयाक मुख पान' हो 'चुगला मुँह अँगोर'

    बिनु 'नेओंते' 'भरदुतिया' मे कोना 'भैया बाढ़ि'क जोर

    'सजबी-दही' बिनु 'मड़र' कोना, देखब 'चौठी-चान' यौ।

    उठू! जागू! मिथिलावासी! पूब अम्बर अरूणायल

    सोलहो कला सँ उगला सुरूज, देखि मिथिला करूणायल

    सँगहि शक्ति समेटू सभ केओ, राखू मिथिलाक मान यौ।

    स्रोत :
    • पुस्तक : झिझिरकोना (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 67)
    • रचनाकार : अशोक कुमार दत्त
    • प्रकाशन : शेखर प्रकाशन, पटना
    • संस्करण : 2017

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY