Font by Mehr Nastaliq Web

हम अहाँक, अहाँ हमर छी

hum ahank, ahan hamar chhi

भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’

भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’

हम अहाँक, अहाँ हमर छी

भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’

और अधिकभुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’

    हम अहाँक, अहाँ हमर छी।

    एक भाषा, एक भूषा, सभक मिथिला-देश घर छी॥

     

    अतीतक अभिमानमे, सब-टा अपन हम सत्त्व त्यागल,

    मोहमे रहलहुँ पड़ल, जहिआ अखिल छल विश्व जागल।

    चेतना-मय द्विजक दल आएल, घुरल कहि नीति-वाणी,

    मनक उपवन देखि उमड़ल, बनल विमुख वसन्त मानी।

    लखल नहि आलोक, रहि अभिमानमे हम पैघ नर छी।

    हम अहाँक, अहाँ हमर छी'।

     

    किन्तु समयक गति विलक्षण, आइ सुखद-प्रभात आएल,

    स्फूर्ति अपना सङ्ग नव उत्साह, नव उल्लास लाएल।

    भेल अछि नव-जागरण गबइछ जागृति-गीत कण-कण,

    मन मलिन नहि बनत तँ सम्भव अवश्य असाध्य साधन।

    जखन छथि नेता 'अमर-पति' 1 तखन हमहूँ सभ अमर छी॥

    हम अहाँक, अहाँ हमर छी।
             

    स्रोत :
    • पुस्तक : भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’ रचना-संचयन (पृष्ठ 111)
    • संपादक : अजीत मिश्र
    • रचनाकार : भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’
    • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2024

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY