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मिथिला माहात्म्य

mithila mahatmya

बुद्धिनाथ झा

बुद्धिनाथ झा

मिथिला माहात्म्य

बुद्धिनाथ झा

और अधिकबुद्धिनाथ झा

    (युधिष्ठिर-भीष्म संवाद, ऊँ महाभारत', जनकप्रसंग अनुशासनपर्वसँ)

    बाबा!

    शान्ति पर्व के बादे

    मन विविध प्रश्न के मादे

    भेल अछि प्रश्न अनेकहु ढंग

    उत्तर केवल जनक प्रसंग

    आब मोन जेना औंटाय

    जिगेसा बरबस बढ़ले जाय।

    जनकजी देह अछैत विदेह

    जाइत स्वर्गहु छला सदेह

    केहन परिपाटी खान पान

    धरा पर मिथिला स्वर्ग समान।

    धरा केहन विपुला थिक

    जनकक धाम धन्य मिथिला थिक

    भाषा मातु मैथिली मान

    मैथिलक जीहेपर तमाम।

    मैथिली मिथिलाक मादेँ कहितहुँ

    मैथिलक ठाठ-बाट किछु बुझितहुँ

    गरिमा निश्चय ओतक महान

    जतऽ राजा तँ, जनक समान।

    बौआ

    राजा आबथु-जाथु जगतमे, संख्यक लाख-करोड़

    मुदा जनक मिथिलहिमे होइ छथि, कहथि शास्त्र निचोड़

    धाम होअय नहि मिथिला सन के, यद्यपि ठाम अनेक

    माय जिनक छथि धन्य मैथिली, सुनू मैथिलक टेक।

    (1)

    पएरमे पनही, माथ पर पाग

    छः टा तानी, चौबन ताग;

    कोकटी धोती, बटुआ संग

    फरिछा कऽ कऽ, बाजक ढंग।

    हाथ सरौता, मुँहमे पान

    उत्तम खेती, भीख निदान;

    बटुकहु करथि वेद के पाठ

    देखब दुर्लभ मैथिल ठाठ।

    सजल साँची, मुठिया टीक

    हे यउ युधिष्ठिर, मिथिला थिक॥

    (2)

    पाहुन आबथि, पाहुन जाथि

    ठाँओं देखि लछमीअहु लजाथि;

    आयल जाओ बैसल जाओ

    करबध आग्रह अपरूप भाओ।

    जुनि पूछू तिरहुतिया राग

    छौंकल जमाइनेँ पटुआ साग;

    झोरगर बड़ी, तरल बऽड़

    अहगर कऽ घी, भातहि पर।

    कुच्चा, फाड़ा, आम अचार

    छप्पन भोगक भेल सचार;

    दहीक अथरा टाँगले सीक

    हे यउ युधिष्ठिर, मिथिला थिक॥

    (3)

    छोटहु काजमे बड़का भोज

    भोज काजमे कोनो ने ओज;

    सजबी दही, नन्हकी धान

    गमगम चूड़ा, दूध-मखान।

    खाजा-लड्डू, मालदह आम

    रसगुल्ला छोड़बय घाम;

    करु मूड़ी जुनि, मटकूरक तऽर

    नहि तँ दही नाकहि पर।

    एतबहिसँ नहि मानल जायब

    ऊठब, पान-सुपाड़ी खायब;

    थकय ने बारीक हर्ज कथिक

    हे यउ युधिष्ठिर, मिथिला थिक॥

    (4)

    ललका आलू माटिक तऽर

    सब फरकारी टाटहिं पर;

    भमल तीर्थ, नहि फिकिर तकर

    घरे-घर गोसाउनिक घर।

    रक्षा-बन्हन, चौठी चान

    देव-उठान, ऊठू भगवान;

    कातिक-माघ मास स्नान

    सामा पाबनि, आयल लबान।

    चूड़ा-छाल्ही, टारा घीक

    हे यउ युधिष्ठिर, मिथिला थिक॥

    (5)

    नाक छूरी सन, डोका आँखि

    नूआ अनमन बगुला पाँखि;

    पान पात सन पातर ठोर

    बिहुँसि देथि तँ भऽ गेल भोर।

    दाड़िम दाँत, मुँहमे पान

    बन दऽ सोनित, सीकीक वाण;

    मास माझ उन्नैस उपास

    तञो नञि कौखन मुँह उदास।

    माताक रूप एहन सन नीक

    हे यउ युधिष्ठिर, मिथिला थिक॥

    (6)

    भल गर्भहिं देह वक्र भऽ गेल

    बापकेँ त्रुटि बुझाइए देल।

    भोथ कएल मन मोहक चक्र

    तत्त्वक पण्डित, अष्टावक्र॥

    (7)

    शिव शंकर छोड़ि सकथि कैलास

    नहि संभव छूटय मिथिलावास।

    रावण के देलनि लाथ लगाय

    पलथा लेलनि ठाम खसाय॥

    (8)

    जँ हरबाह लागनि के धरय

    सीताकेँ उपजा कऽ छोड़य।

    श्रुति पुरुष-नारि केर ठोरहिं पर

    अछि वेद तऽर, व्यवहार ऊपर॥

    (9)

    बरु केहनहु परम पुरुष श्रीराम

    मिथिला छोड़बय हुनकहु घाम।

    चर-अचर मैथिल निर्भीक

    हे यउ युधिष्ठिर, मिथिला थिक॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : अक्षर निर्क्षर (मैथिली काव्य-संग्रह) (पृष्ठ 59)
    • रचनाकार : बुद्धिनाथ झा
    • प्रकाशन : क्रिएटिव कैम्पस प्रकाशन, हैदराबाद
    • संस्करण : 2015

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