Font by Mehr Nastaliq Web

हिममय व्यभिचार

himmay vyabhichar

अनुवाद : श्यौराजसिंह जैन

यांको पोलिच-कामोव

यांको पोलिच-कामोव

हिममय व्यभिचार

यांको पोलिच-कामोव

और अधिकयांको पोलिच-कामोव

    यहीं मर जाएँगे, केटी, अशक्त हैं पैर मेरे;

    हिममय वन से निकास नहीं, अंधकार में राह नहीं;

    सब आच्छादित है, स्वजनों के चिह्न मिट चुके हैं ;

    हाथ मेरा मर चुका है, विचार पर कुहरा गिरा है;

    बरबाद हो जाएँगे, केटी, मृत्यु के हैं लोलुप जबड़े।

    मेरी कविताओं के ग्रीष्म की याद है तुम्हें?

    काग़ज़ सुनाएगा संतति को मेरे पाप, मेरा नाम होगा गाली;

    तुम्हारे लिए रोएँगे, आँसू भी होंगे, केटी;

    मेरी पंक्तियों ने तुम्हारा कुमारीत्व छीना, मेरी पुस्तक में

    तड़कता व्यभिचार हो तुम।

    भयातुर हैं नेत्र, साँस जम चुकी तुम्हारी;

    शीत से सफ़ेद हो तुम, होट फटे तुम्हारे;

    आत्मा काँपती है, उसकी लय तुम्हें थरथराती;

    वातावरण मृत, तुम्हारा गीत उस पर मँडराता;

    अवधि उसकी अल्प, वह हिम बनकर हम तक लौटता है।

    सुन रही हो शब्द मेरे, विपथगा लाजवंती?

    निस्स्वर व्यभिचार हैं वे, हिमवंत दौड़ रहे तुम तक;

    मेरे हाथों ने तुम्हें घेरा है—ओह, दे दो मुझे रक्त

    का उपजाप।

    देखो, सूर्य को ग्रहण लगा, उसकी किरणें फीकी पड़ीं;

    अकेले रह गए हम शीत-मुख के संत्रास में,

    काला पड़ रहा है प्रेतत्व का बछेड़ा;

    हमको पुकारता, उसका गान कामार्त्त है;

    उन्मत्त हैं दाँत उसके, हमारी अस्थियाँ पीस देगा।

    दे दो मुझे रक्त का उपजाप—रक्त में हमारा जीवन है;

    असुरों के सशक्त वह, मृत्यु के आक्रमणों से लोहा लेगा;

    श्वास भरो कि कूद जाएँ, एक-दूसरे में सिमट जाएँ हम;

    उनींदा है रक्त हमारा—जागरण में मुक्ति है।

    देखो, हिमपात हुआ, हमारा देव मर रहा है;

    मेरी जननी में प्रभा रही, उसके ओंठ मृत हैं;

    स्तनों में दूध नहीं, उसके बच्चे मर जाएँगे;

    हिममय है वितंक, कुहरा रेंगता हमारे शिविर को ;

    हिमवत् हो गए शब्द मेरे, हम पर सीसे ढह रहे।

    तुम्हारा रक्त कहाँ है, प्रेयसि?

    नाख़ून मेरे खोजेंगे और दाँत परीक्षक होंगे,

    वे भूख की आँखें, प्रलय के स्वर-से होंगे।

    बहरी हो मेरे शब्दों के प्रति, गूँगी है वासना तुम्हारी;

    कहाँ है ख़ून तुम्हारा, मेरे गीतों के सपनों की नारी?

    मरती जा रही हो, प्राणप्रिय, तुम्हारे दफ़न पर घंटध्वनि नहीं;

    रक्त जम चुका है तुम्हारा, अस्थियाँ बिखर चुकीं;

    मेरी साँस में गर्मी नहीं, चुंबन भी मृत है।

    भोजन तैयार है, प्रतिन, भरपेट आहार करो,

    एक ही थाली है, केटी, हमारे शरीर भी खाद्य हैं;

    हम शादीशुदा हैं, नारी—आँतों में जयंती प्रतीक्षारत है;

    शीघ्र ही हमारा गौना, पलंग बिछा हुआ है;

    पलंग हमारा बिछा हुआ है—कीलों से जड़े तख़्ते हैं।

    एक ही क़ब्र है हमारी, उस पर सलीब नहीं है;

    एक ही ताबूत हमारा, शरीर हमारे आलिंगनरत हैं;

    धरती नम है—ओ मृत प्रेयसी।

    आत्मा नहीं हमारे कंकाल में और गलते माँस में;

    कीड़े हमारे चुंबन, रंगीन तख़्ते झुक आए हैं।

    क्या टपकते हमारी क़ब्र पर आँसू और फूल खिलते हैं क्या?

    क्या दुलराती हमें कवि की लेखनी और सहानुभूत यौवन की

    गर्माई क्या?

    क्या रौंद डालेगी तहों को, ताबूत भेद जाएगी क्या?

    क्या हमारी अस्थियाँ पा जाएगी, अंतिम पद पढ़ जाएगी क्या?

    मेरा युग अल्प ही था। आत्मा की अकाल मृत्यु हुई।

    अकाल थी मृत्यु ज्यों समय से पूर्व मेरी वासनाएँ;

    मृत समाधि से बहती चीख़ जिसका निंद्य स्वर है;

    वह तिरस्कार के क्षोभ, प्रतिरोध की लपट-सा है।

    विभ्रांत व्यभिचार को देखिए, अस्तित्व या उन्माद देखिए;

    मेरे विचार को शाप दीजिए, उसके पंख जला दीजिए;

    वह लाश से निकसित है, उसकी श्वास विद्रोही है :

    मृत शरीर चुंबनरत हैं, उसकी चीख़ शोचनीय है।

    माँ प्रकृति किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई थी, प्रसवकाल में मदमत्त

    थी :—

    मेरा युग सँकरा था, मेरी आत्मा विशाल थी।

    स्रोत :
    • पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 28)
    • रचनाकार : यांको पोलिच-कामोव
    • प्रकाशन : ज़ाग्रेब, नई दिल्ली
    • संस्करण : 1978

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY