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हवाक दिशा नहि मोड़ब

havak disha nahi moDab

छत्रानन्द सिंह झा

छत्रानन्द सिंह झा

हवाक दिशा नहि मोड़ब

छत्रानन्द सिंह झा

और अधिकछत्रानन्द सिंह झा

    हवाक दिशाकेँ मोड़बाक प्रयास

    नहि करू।

    हवा बहैत अछि—

    कखनो सिहकी कखनो बिहाड़ि

    आ,

    कखनो झंझावात।

    बहैत रहल अछि

    अविराम।

    अहाँक फूसक घर

    झंझावातक प्रहार नहि सम्हारि सकत,

    तेँ कहैत छी

    हवाक दिशाकेँ मोड़बाक प्रयास

    नहि करू।

    हवाकेँ अपन मुट्ठीमे

    बन्द करबाक अहाँक प्रयास

    आइ विफल भऽ गेल।

    हाँ एकर झंझावाती रूपसँ

    डरि कोनो मजगूत देबालक अढ़मे

    नुकयबाक असफल प्रयास कऽ रहल छी।

    झंझावात ओत्तौ पहुँचत

    देबालकेँ डाहि देत;

    अहाँ निरुपाय

    अपनाकेँ बचबैत

    एमहर-ओमहर भगैत रहब;

    मुदा झंझावातो उत्पीड़नसँ

    अपनाकेँ नहि बचा सकब।

    हवाक दिशाके मोड़बाक प्रयास

    अहाँ नहि करू।

    हवाकेँ अपन मुट्ठीमे

    बन्द करबाक प्रयास नहि करू।

    फूसक घर उड़िया जायत

    अस्तित्वहीन भऽ जायब अहाँ

    तेँ कहैत छी—

    हवाक दिशाकेँ मोड़बाक प्रयास

    अहाँ नहि करू।

    स्रोत :
    • पुस्तक : एक गुलाबक लेल (पृष्ठ 53)
    • रचनाकार : छत्रानन्द सिंह झा
    • प्रकाशन : नीलकण्ठ प्रकाशन, पटना
    • संस्करण : 1988

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