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हॉस्टल के कमरों में

haustal ke kamron mein

ज्योति यादव

ज्योति यादव

हॉस्टल के कमरों में

ज्योति यादव

और अधिकज्योति यादव

    हॉस्टल के कमरों में सिर्फ़ हल्ला नहीं होता,

    एक ख़ामोश चीख़ भी होती है

    जो किताबों की अलमारी में बहुत भीतर

    छिपा दी जाती है

    और फिर कभी सुनी नहीं जाती।

    अगली बार, आप किसी से उसके कमरे पर मिलने जाएँ

    और वह दरवाज़ा खोलने में देरी करे

    तो थोड़ा वक़्त दें उसे…

    बहुत संभव है कि वह अपनी तमाम मायूसी पोंछ,

    आपसे सिर्फ़ मुस्कुराकर मिलना चाहता हो।

    घर से दूर जाकर किसी मज़दूर का बच्चा

    अपने सपनों का इतना सटीक हिसाब रखता है

    कि संसद के सर्वोत्तम बनिये तक शर्मिंदा हो सकते हैं।

    ये बात मात्र तीस या तीन सौ रुपयों की नहीं है

    ये बात उन चालीस पैसों की भी है

    जिसे बचाने वह डेढ़ किलोमीटर दूर वाले

    ज़ेरॉक्स सेंटर तक पैदल जाता है।

    आपकी बेहूदा संपन्नता

    दाल का पतलापन और रूखी रोटियाँ

    देख सकती है, खा नहीं सकती

    और समझ तो हरगिज़ नहीं सकती।

    ये बच्चे जब सिर्फ़ अपने मजबूर बाप के लिए रोते हैं,

    तो भी उस मराठी किसान के लिए रोना नहीं भूलते,

    जो इस साल भी अपने घर को दीवाली नहीं दे सका।

    अपने कमरे के सीलिंग फ़ैन से लटक जाने वाले छात्र,

    और अपने ही हाथों लगाए नीम के पेड़ पर झूल जाने वाले किसान,

    हुक्मरानों के एक दस्तख़त से बचाए जा सकते थे,

    बचाए नहीं गए।

    ढिबरियों की रौशनी में देखे जाने वाले ख़्वाब

    जब तक पूरे नहीं किए जाते,

    आँखों में केरोसिन की तरह जलते रहते हैं…

    और उनके साथ जलता है लखनराम का पसीना-ख़ून,

    कि जिसका बड़ा लड़का जे.एन.यू. में पढ़ता है।

    आपसे अपील है और विनम्र, करबद्ध अपील

    कि आप कम से कम एक दफ़ा

    अपना ख़ून पसीना जलाकर ज़रूर देखें

    और तब भी अगर आप ज़िंदा बचे, तो मेरी ये बात याद कर लें

    कि छात्र, किसान और विश्वविद्यालय

    मर जाने से डरते नहीं हैं

    इसलिए और सिर्फ़ इसलिए इन्हें ज़िंदा रखना

    हमारी-आपकी साझी ज़िम्मेदारी है, महोदय!

    स्रोत :
    • रचनाकार : ज्योति यादव
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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