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हरे रामा, मनमोहक, मनोहारी

hare rama, manmohak, manohari

मनोज मिश्र ‘कप्तान

मनोज मिश्र ‘कप्तान

हरे रामा, मनमोहक, मनोहारी

मनोज मिश्र ‘कप्तान

और अधिकमनोज मिश्र ‘कप्तान

    हरे रामा, मनमोहक, मनोहारी, बदरिया कारी, रे हारी।

    हरे रामा, मेघा भरैं किलकारी, बदरिया कारी, रे हारी।

    चम चम चम चम चौंधा दलकै।

    बिच बिच बूँद पयोनिधि छलकै।

    पछुआ चलै कबौ पुरवाई,

    दूनउ सवति केन्द्र हलचल कै।

    हरे रामा, के जीती के हारी, बदरिया कारी रे हारी।

    करिया बादर जिव डरवावै।

    भूरा बादर जल बरसावै।

    काली डिउहार के थाने,

    पूरा गाँव साथ मा गावै।

    हरे रामा, साथ देति बँसवारी, बदरिया कारी रे हारी।

    लड़िके बुढ़वन केर लँगोटी।

    पहिरे खेलयँ काल कलौटी।

    बरखा रानी के अगवानिम,

    रोटी घरे बनैं बेसनौटी।

    हरे रामा, परवरि कै तरकारी, बदरिया कारी रे हारी।

    हम परदेसिन कै मजबूरी।

    नौ से छः कर्तव्य जरूरी।

    गाँव जवाँरि से दूरि भले, पर,

    हुई नहीं है दिल से दूरी।

    हरे रामा, चल मनोज खसियारी, बदरिया छाई रे हारी।

    स्रोत :
    • पुस्तक : अवधी मिठास (पृष्ठ 50)
    • रचनाकार : मनोज मिश्र ‘कप्तान’
    • प्रकाशन : सर्वभाषा प्रकाशन, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2025

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