हर बार कुछ फिसलता है
har baar kuch phisalta hai
हर बार कुछ फिसलता है
हमारे हाथों से
और हम हर बार
करते हैं विश्वास
कि सुनी जाती हैं
उम्र बढ़ाने की प्रार्थनाएँ,
मुक़म्मल होती हैं ख़्वाहिशें
पर नहीं होता ऐसा
विनतियाँ सुनी जाती हैं तब तक
जब तक हाथों की
लकीरों ने बचा कर रखा हो
उम्र को
और जब अंतिम छोर पर होती हैं वे लकीरें
तब रेत की तरह फिसलता है
वह इंसान हमारे हाथों से,
और उसके साथ ही
फिसलता है एक संबंध,
किसी अभागे जीवन का पहला सम्बल,
कभी फिसलती है रिश्तों को जोड़ने की सबसे मज़बूत कड़ी।
मैंने नियति को जितना स्वीकार किया
उतना ही विद्रोह भी किया
पर नियति से विद्रोह
हर बार कष्ट ही देता है।
क्योंकि हम हर बार होते हैं मज़बूर
नियति के हाथों
छटपटाते,
तड़पते,
खीजते और
याद करते हुए यह कि
पिछली बार भी
मुठ्ठियों को कसके भींच लेने की बाद भी
फिसला था
चुपके से हाथों से कुछ भाग्य
कुछ और ख़त्म होते हैं हमारे भीतर से
हम...
- रचनाकार : अनामिका अनुगूँज
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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