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तेरे हाथ अछूते

tere haath achhute

अनुवाद : श्यौराजसिंह जैन

वैस्ना पारुन

वैस्ना पारुन

तेरे हाथ अछूते

वैस्ना पारुन

और अधिकवैस्ना पारुन

    तू, जिसके हाथ हैं अछूते अधिक मेरों से

    और जो बुद्ध है निश्चिंता-सी

    तू, जो पढ़ सकती है मस्तक से

    उसका एकाकीपन मुझसे अधिक,

    तू जो हटाती है उसके चेहरे से

    सुस्त छाया बादलों की

    वसंत की बयार हटाती है जैसे

    शिखर पर तैरती छाया बादलों की।

    यदि तेरा आलिंगन हृदय को बनाए दृढ़

    यदि तेरी जंघाएँ दर्द को रोकें,

    यदि तेरा नाम प्रशांति

    उसके विचारों की, और तेरा कंठ

    उसकी शैया की शीतलता

    और तेरे स्वरों की यामिनी

    मधुबन-सी जो अछूता अभी तूफ़ानों से,

    तो रह जा समीप उसके

    बन जा साध्वी अधिक उन सबसे

    जिन्होंने प्रेम उससे किया पूर्व तुझसे।

    डरना उन गूँजों से निकट आतीं

    प्रणय की अबोध सेजों के।

    और बन जा समृद्धि उसके स्वप्न की

    अदृश्य पर्वत के नीचे

    गरजते सागर के कगार पर।

    उसके तट पर टहलना। मिलेंगी तुझे

    दुखी डॉलफ़िनें।

    उसके बन में फिरना। भले सरीसृप

    तेरा बुरा करेंगे।

    और प्यासे नाग जिन्हें मैंने पालतू बनाया था

    तेरे सामने नत रहेंगे।

    गाएँ तेरे लिए चिड़ियाँ जिन्हें मैंने

    चुभते कोहरे की रातों में गरमाया।

    स्नेह करे तुझे बालक जिसे मैंने

    एकांत पथ पर घातकों से बचाया था।

    सुगंध दें वे पुष्प जिन्हें मैंने

    अपने आँसुओं से सींचा था।

    मैंने प्रतीक्षा नहीं की उसके पौरुष के

    सर्वोत्तम काल की। उसकी सृजन-क्षमता को

    अपने वक्षों में धारण किया

    उजाड़ दिया था जिन्हें

    प्रदर्शनी के लिए पशु हाँकने वालों

    और ललचाए गुंडों की निगाहों ने।

    मैं कभी नहीं ले जाऊँगी हाथ पकड़ कर

    उसके बच्चों को। और कहानियाँ

    जो कब से सँवारी थीं उनके लिए

    शायद सुनाऊँगी रोती हुई

    काले वनों में परित्यक्त

    छोटे अभागे भालुओं को।

    तू, जिसके हाथ हैं अछूते अधिक मेरों से,

    उसके स्वप्न की समृद्धि बनना

    जो अबोध रहा आया है।

    लेकिन मुझे देख लेने देना

    उसका चेहरा, जब तक उस पर

    अचीन्हे वर्ष उतरें।

    और बताती रहना कुछ उसके बारे में कभी-जभी,

    कि मुझे अपरिचितों से पूछना पड़ जाए

    आश्चर्य है मुझ पर जिन्हें, और पड़ोसियों से

    अफ़सोस है मेरे धैर्य पर जिनको।

    तू, जिसके हाथ हैं अछूते अधिक मेरों से,

    उसके सिरहाने के निकट रही आना

    और उसके स्वप्नों की समृद्धि बनना!

    स्रोत :
    • पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 117)
    • संपादक : श्यौराजसिंह जैन
    • रचनाकार : वैस्ना पारुन
    • प्रकाशन : बाहरी पब्लिकेशंस, नई दिल्ली
    • संस्करण : 1978

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