हमर नामकेँ दाबि सकत के?
hamar namken dabi sakat ke?
हमर नामकेँ दाबि सकत के?
कादोसँ रवि झाँपि सकत के?
प्रतिपक्षी क्यो अड़ि न सकै अछि।
कर्मभूमिमे बढ़ि न सकै अछि।
क्रद्ध दिनेशक अनल किरणमे।
शिशिरक सर सन हिम वर्षणमे॥
मेघनाद निभ घन गर्जनमे।
प्रलयङ्कर भूकम्प पवनमे॥
मरुथलमे सागरमे बनमे।
लोभ जालमय राजभवनमे॥
सूतल जागल अहनिशि प्रतिपल।
मिथिलाकेर सोचमे लागल॥
हमरासँ बढ़ि आन रहत के?
हमर नामकेँ दाबि सकत के?
कय देशक हित जीवन अर्पण।
करी सदा समरक अन्वेषण॥
मानि लोभकेँ बाटक बन्धन।
वीर करय नहि लाभक चिंतन॥
लाभ लोभमे लागल लोभी।
देशक गौरव बढ़ा सकत के?
हमर नामकेँ दाबि सकत के?
देश समाजक ध्यान न राखय।
बुझय एक रङ शत्रु मित्र जय॥
मांस पिण्ड पेबामे पागल।
रहय सदा काके शृगाल दल॥
तेजि अमर पद बलिदानी केर।
इर्ष्यें वीर शृगाल बनत के?
हमर नामकेँ दाबि सकत के?
- पुस्तक : कतेक दिनक बाद (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 1)
- संपादक : डॉ कैलासनाथ झा, शिवशंकर श्रीनिवास
- रचनाकार : काञ्चीनाथ झा 'किरण'
- प्रकाशन : किरण मैथिली साहित्य शोध संस्थान (धर्मपुर, लोहना रोड, दरभंगा)
- संस्करण : 1989
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