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ज्ञान के बिरवा

gyaan ke birva

मोहनलाल यादव

मोहनलाल यादव

ज्ञान के बिरवा

मोहनलाल यादव

और अधिकमोहनलाल यादव

    ससुर गरीबन पढ़इ पावैं

    हक की बात करइ पावैं।

    सीक्षा के बेवपार बना दो

    अउर महँगा बाजार बना दो

    अनपढ़ अउर गँवार बना दो,

    जीवन को अँधियार बना दो।

    ज्ञान की जोती जरइ पावैं

    ससुर गरीबन पढ़इ पावैं।

    सरकारी इस्कूल बेंचि दो

    पढ़ना अहै फिजूल, बेंचि दो,

    घृणा द्वेष का पाठ पढ़ाओ

    नफरत अउर उन्माद बढ़ाओ।

    प्रेम के झंडा गड़इ पावैं

    ससुर गरीबन पढ़इ ना पावैं।

    पढ़ि लेइहैं मूरख रइहैं

    अपने हक खातिर लड़ि जइहैं,

    जोर जुलुम अन्याय सहिहैं

    तब दिन के रात कहिहैं।

    सुख की जिनगी जियै पावैं

    ससुर गरीबन पढ़इ पावैं।

    बिना जरे उजियार होई

    जीवन नइया पार होई,

    जिअइ के खातिर मरइ के होई

    पढ़इ के खातिर लड़इ के होई।

    मन में प्रन ठानि लो भइया

    कौनो अनपढ़ रहइ पावैं।

    ज्ञान के बिरवा मरइ पावैं।

    अकल के दुस्मन हरदम सोचिहैं

    ससुर गरीबन पढ़इ पावैं।

    स्रोत :
    • पुस्तक : अलगौझी (पृष्ठ 41)
    • रचनाकार : मोहनलाल यादव
    • प्रकाशन : हंस प्रकाशन, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2023

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