हिंदी के महत्त्वपूर्ण रचनाकार शैलेश मटियानी को समर्पित
वह स्मृतियों को खाता है दिन-रात कुतर-कुतर कर
यश के सर्वोच्च शिखर से आने वाली घोषणाओं को सुन
हल्का मुस्कुरा देता है
कोई पत्र नहीं आता अब उसके पास
वह किसी गुट के आमंत्रण-सूची में नहीं
किसी किताब के उतार-चढ़ाव में
कोई भूमिका नहीं उसकी
साहित्यिक अवदान की खोज-ख़बर रखने वाले आलोचक भी
अब उसका ज़िक्र नहीं करते
वह गुमनामी से नहीं
इस समय के घुटन से परेशान है
वह घंटों रह सकता है अपने साथ
ऊब सकता है
सो सकता है उदासी की खाई में
कुछ होने के लिए किए जाने वाले
अनिवार्य अभिनय को ठुकरा सकता है
कुछ होने के क्रम में हो सकता है सिर्फ़ लेखक
वह नहीं लिखता ताक़तवर लोगों की भाषा में
उस भाषा में लिखता है वह
जिसके नसों में बहता है असंख्य श्रमिकों का गीत
इसी भाषा में दर्ज करता है वह
पंक्ति में खड़े आख़िरी आदमी की पहली रुलाई
क़स्बों के ताप से तपा है उसका जीवन
चमकते शहरों ने कभी उसे नहीं खींचा अपनी ओर
अपने क़स्बे के बुज़ुर्ग क़ुली से मिलने जाता है अक्सर
और वह अब भी लिखता है
चिड़ियों और दरख़्तों के लिए
अपने ज़िंदा होने की घोषणा करते हुए
एक दिन जब शब्द नहीं देंगे उसका साथ
तब वह बनाएगा बच्चों के लिए खिलौने
और सीखेगा चित्र बनाना।
- रचनाकार : राकेश कुमार मिश्र
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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