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गुलाबों का त्यौहार

gulabon ka tyauhar

अनुवाद : श्यौराजसिंह जैन

तिन उयेविच

तिन उयेविच

गुलाबों का त्यौहार

तिन उयेविच

और अधिकतिन उयेविच

    चुन लो गुलाब, बालाओ, कि आज कांति दें,

    यह यौवन की विदा, इस ठंडी घाटी में।

    पाटल पवित्र स्फुलिंग हैं जो छिटक उठे

    तुम्हारे भी मनों के अंतर से इस कामाचारी मई में।

    गुलाब विचारों की तड़ित हैं, शरों का हृदय हैं,

    गुलाब वैभवी, मूल्यरहित, पथ के किनारे उद्यान में।

    ये सुवास नभ की, दृष्ट के नेत्र हैं,

    भयावह वनों की गंध लिए प्रकृति का संगीत हैं।

    मनहर शीतल छाया में विलासी श्वास भरें ये गुलाब

    मायावी जालों के भँवर में ज्यों अल्पतम, सुंदरतम क्षण।

    घाटी में प्रिय रवि को अभिवादन वनें ये गुलाब,

    बनें भ्रमण अति प्रफुल्ल छाया की अंतिम लीक तक।

    सुभाग के स्मृति-पटल पर प्रेम-वाणी हैं गुलाब।

    निर्मल कुंड में प्रकाश की नूतन आभा-से।

    जो जीवन हित जनमता, तरुणाई हित मरता, वह गुलाब

    चुन विह्वल माला से मस्तक पर धर ले।

    आपके बंदियों के भय की चाटुकारी करूँगा

    कि कहीं रक्तमयी पाषाण की वेदी के गुलाब

    वे भूषण बन जाएँ जो कामोन्मादित, अरुण परिदृष्ट में

    उनको भय दिखाता समाधि का।

    सेहरे के गुलाब कहीं शवों के सुरद्रुम तो नहीं!

    वे सांत्वना देते उदारों को, रुद्रों को,

    अपनी मृदु गंध से सभी पीड़ितों को ले जाते,

    उनको भी जो रक्त स्राव में सिहरन से सरसराते।

    मैं रोता गुलाब को, कनेर में खिलता मैं,

    जो है वह तेजपत्र ही शांति का गुलाब।

    प्याले से मगर मदमत्त दृष्टि गुलाब की पाता मैं :

    कनेर का भी फूल मदिरा की गहरी बूँद में रंगा।

    गुलाब बरसें ऊपर से, आज, त्यौहार में!

    गुलाब छत से, गुलाब नभ से, गुलाब उद्यान से।

    बरसें बरसात से, पवन से, कोप की धूलि-से

    गुलाब सत्य के, गुलाब तारों के, गुलाव सपनों के।

    कि हमारे होट बन्द कर दें, कि हमारे नेत्र मूँद दें

    गुलाब मदमत्त, गुलाब क्षुब्ध, गुलाब के बाग़ीचे।

    गुदगुदाता चुंबन लिए, चुपके से प्रवाहित होता

    ज्यों मृत्यु बिल्कुल कल्पित और स्वल्प चली आए।

    दिवास्वप्न के धुंध में कलश ज्यों प्रकट हों,

    कि दमकें और बुझ जाएँ, कि निष्प्रयोजन हो।

    बदलते प्राण की क्षुधा, ऊषा, सांध्यबेला,

    आओ चुनें, तोड़ें मालाएँ! पीएँ, गुलाब पीएँ!

    आशीष गुलाब के खेतों को, सकल उसकी जाति को,

    जो सूर्य के देव के यौवन-रहस्य पर मँडराती :

    वे हमें द्रुतगामी वाहन में मुक्ति तक ले जाते,

    वे उपहार धरती के और मंजूषा प्रतिश्रव की।

    गीतों को गुलाब चाहिए, गुलाबों को गीत अपने,

    जो कुछ भी क्षण दे, जो भी गहनतम अर्पित कर दे।

    पौधों के सोतों से स्फुटित स्तुतियों की फुहारें हैं,

    देवदूत, उतर आ, गा चिर- गीत गुलाब के।

    अतीत की अशुद्धि के विरुद्ध, तेरे स्वर पर

    मंत्रमुग्ध-सा नत होऊँगा, तेरे संग ही धन्य कहूँगा

    उस सुभाग की वर्षा को, लोबान की अभिषेक को,

    गुलाब के व्रत के आगे, बस एक बार भक्ति से!

    शब्दों की कलकल के बजाय वे हमारे आदर्श हों

    कि अग्नि-से हों, दीन हों; उन्हें हम तोड़ लें

    कि कहीं कोई कारण बाधक बने, सब वर लें,

    जैसे कि गुलाब संग जीएँ, उसके ही संग मर लें।

    जितने हो सकें अधिक गुलाब! उन्मत्तता के लिए

    अधिक से अधिक गुलाब, काँटों, घास-पातों सहित,

    उनके गुच्छे सजाकर, सीने में छिपाकर

    घावों से बिलखूँ और हर्ष से रोऊँ।

    जितने हो सकें अधिक गुलाब! अधिक से अधिक!

    जितने अधिक हो सकें सब गुलाब!

    स्रोत :
    • पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 36)
    • रचनाकार : तिन उयेविच
    • प्रकाशन : ज़ाग्रेब, नई दिल्ली
    • संस्करण : 1978

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