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गूहल चोटी कोना फुजि गेल

guhal choti kona phuji gel

बिभा विमर्श

बिभा विमर्श

गूहल चोटी कोना फुजि गेल

बिभा विमर्श

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    एखनो हमर हृदय

    जोगाकऽ रखने अछि

    अहाँक देल अमिट अनुराग

    जकरा प्रीतिक डोरि संग

    बान्हि रखने अछि सुरक्षित अस्मिता

    तेँ हम

    बिसरि नहि पबैत छी

    किछु अहम स्मृति

    संग किछु बीतल अनकहल क्षण

    अहाँ अपन ठोरक पिहुआ लऽ

    गोदने छलहुँ गोदना हमर समुच्चा देह

    उकेरने छलहुँ किछु आरेख

    जे फलित भेल पश्चात हमर पाथेय

    ओना बेसी मोन तँ नहि अछि

    मुदा उपराग नहि दैत छी

    नहि भेटल हमर हेरायल किछु चीज

    जे प्रथम मिलनमे अहाँ चोरा लेने छलहुँ!

    ओह, कोना कऽ झट दऽ

    बीति गेल पहर, जकरा मोन पाड़ैत

    बिहुँसि उठैत अछि एखनो हमर हृदय

    बढ़ि जाइत अछि ओकर स्पंदन

    मोने अछि

    हमर टिकुलीक लालिमासँ

    बढ़ि गेल छल अनायास अहाँक तेज

    हमर लजायल काजर

    निरैंठ लिपस्टिकमे ओहि पहर

    भुतिया लेने छलहुँ अहाँ अपन अस्तित्व

    मुदा फेर हमर

    गूहल चोटी कोना फुजि गेल

    जकरा अहाँ मुट्ठीमे भरैत

    तकरा अपन पौरुषसँ तीरैत

    निभेर कऽ देने छलहुँ हमर स्त्रीत्वकेँ

    तखन ठीके

    गमकि उठल छलहुँ हम एना

    जेना गमकि जाइत छैक

    कुम्हलायल फूलक कोंढ़ी

    भऽ जाइत छैक भकरार

    फेर, चूसि लैत छैक तकरा

    मोन भरि भमरा, स्वेद

    भऽ जाइत छैक सहसा निर्गंध

    से ठीके

    अहाँ केहन जादूगर छिऐ

    कोन मोहिनी मंत्र छिऐ अहाँ

    जकर प्रभाव घटब तँ दूर

    बढ़ले जाइत छै नित्य-प्रति

    जेना बढ़त जाइत अछि अवस्था!

    स्रोत :
    • पुस्तक : नहि सीता नहि (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 82)
    • रचनाकार : बिभा विमर्श
    • प्रकाशन : नवारम्भ, पटना/मधुबनी
    • संस्करण : 2023

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