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धरती धानी धानी लागै ना

dharti dhani dhani lagai na

मनोज मिश्र ‘कप्तान'

मनोज मिश्र ‘कप्तान'

धरती धानी धानी लागै ना

मनोज मिश्र ‘कप्तान'

और अधिकमनोज मिश्र ‘कप्तान'

    बदरा बरसै, खेतवा, ऊंचे खाले, पानी लागै,

    धरती धानी धानी लागै ना

    टप टप टप टप बूँद परति है, हरियर हरियर पाती।

    धरती पुत्र निहाल भवा भई, गज भर बढ़ गई छाती।

    बइठे एसी मा जे, उनका महज कहानी लागे।

    धरती धानी...

    हरसिंगार लिहे हरमुनिया, गावय राग मल्हारी।

    महुआ मस्त मृदंग बजावै, बाँसुरिया बँसवारी,

    चमकै इंद्रधनुष तब, दुलहिनि बरखा रानी लागे

    धरती धानी...

    यक यक बिरवा लखै पूत घस, बैठा फसिल निरावै।

    कजरी ठुमरी तान भरय तौ, कबौ सुमिरनी गावै।

    खेतिहर खड़ा मेढ़ि पर, राजा हिन्दुस्तानी लागे,

    धरती धानी...

    रंग बिरंगे बादल कै दल, उमड़ि-घुमड़ि घिरि आवैं।

    वारिधि से वारिद, जल भरिकै, धरती पर बरसावें।

    किरपा इन्द्रदेव कै, उनही कै कप्तानी लागै।

    धरती धानी धानी लागै ना

    स्रोत :
    • पुस्तक : अवधी मिठास (पृष्ठ 60)
    • रचनाकार : मनोज मिश्र ‘कप्तान’
    • प्रकाशन : सर्वभाषा प्रकाशन, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2025

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