मुझे सांत्वना नहीं होती अब किसी के प्रति
मुझे नहीं प्रभावित करते महापुरुषों के कहे वाक्य
मुझे नहीं प्रभावित करते उनके कृत्य
मेरे लिए सब वक्त की भट्टी में धककता-सा कोयला हैं
जो बुझ रहा है धीरे-धीरे
जबकि मैं जानता हूँ
दुनिया की लगभग आधे से ज़्यादा आबादी
इस बहस में उलझी रहेगी
फलाँ ने क्या कहा था
फलाँ ने क्या किया था
फलाँ इतिहास में जमा हैं किसी मरकस की तरह
फलाँ की वजह से बदल गई भविष्य की चाल
फलाँ महान था और नहीं था
फलाँ के लिए होती लंबी बहसें
भविष्य का दरवाज़ा खटखटाते लोग
जिनके सामने खड़ा होकर
वर्तमान हँस रहा होगा दाँत फाड़कर
बचे बाकी के लोग
तलाश रहे होंगे रोटी।
- रचनाकार : अवकेश कुमार प्रजापति
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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