ग़ुरूर
ghurur
तुम नफ़रत नहीं
प्रेम ख़त्म करना चाहते हो
तुम चुप्पी नहीं
संवाद ख़त्म करना चाहते हो
तुम ज्वाला नहीं
ज्योति ख़त्म करना चाहते हो
तुम मोती ही नहीं
पूरी माला ख़त्म करना चाहते हो
तुम ज़मीन ही नहीं
पूरा आसमान ख़त्म करना चाहते हो
तुम अध्याय ही नहीं
पूरा इतिहास ख़त्म करना चाहते हो
तुम आंदोलन नहीं
शांति ख़त्म करना चाहते हो
तुम आँखों का पानी ही नहीं
पूरी करुणा ख़त्म करना चाहते हो
तुम हथेली की गर्माहट ही नहीं
सारे जज़्बात ख़त्म करना चाहते हो।
पर ये सब मिटाने के पहले
तुम्हें कुछ लिखना सीखना होगा
कुदरत और अदीबों की लिखी
इबारत को पढ़ना होगा
तुम से पहले भी कई आए थे
जिन्हें भी बदगुमाँ था
जाते वक्त उनके हाथ भी खाली थे
दो गज ज़मीन, दो गज कफ़न में
लिपटने वाला आदमी
क्या-क्या सोच जाता है
अज़ल से अदब तक
मैं, मैं, करने वाला ये आदमी
अपने शरीर में कम
अहंकार में ज़्यादा रहता है
उसे क्या पता
मिटाना उसका काम नहीं है
ये काम तो सदियों से
मिट्टी करती आई है।
- रचनाकार : संतोष सिंह
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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