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कानब तँ जलमय हएत देश!

उमड़ै अछि उर-सागर रहि रहि,

लखि-लखि दलितक दुर्दशा, क्लेश!

जग प्रभा-हीन, जग प्रभा-हीन,

धन, सम्पति, सुख कृपणक अधीन,

आनन्द-निरत पामर, मलीन,

मरि रहल भूख सँ अछि मानव,

देखल नहि जाइछ करुण बेश!

कानब तँ जलमय हएत देश!

अछि कतए धर्म, अछि कहाँ लाज,

चूसए शोणित स्वार्थी समाज,

नर-पशुहिक फूटल ढोल बाज,

करुणा पाओत विश्राम कतए?

ममता-मायाक छूति लेश!

कानब तँ जलमय हएत देश!

बहि रहल विचित्रे अछि बिहाड़ि

सभ केओ बैसल अछि हृदय हारि,

वसुधा कनैत छथि ठोह पारि,

जीवन-संशय समुपस्थित अछि,

धएने अछि कसि कए काल केश!

कानब तँ जलमय हएत देश!

के देत अन्न, धन, हृदय, दान?

के अछि मानी, के अछि महान?

भू-स्वर्ग बनल रौरव समान,

“भुवनेश! बिना जगने नहि गति,

जागू श्री शिव, जागू महेश!

कानब तँ जलमय हएत देश!

स्रोत :
  • पुस्तक : भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’ रचना-संचयन (पृष्ठ 67)
  • संपादक : अजीत मिश्र
  • रचनाकार : भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’
  • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
  • संस्करण : 2024

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