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गाँव की दहलीज़ पर प्रेम

gaanv ki dahliz par prem

कुमार विक्रमादित्य

कुमार विक्रमादित्य

गाँव की दहलीज़ पर प्रेम

कुमार विक्रमादित्य

और अधिककुमार विक्रमादित्य

    सरिता की कल कल ध्वनि जहाँ

    सुनाती है तान रह रह कर

    पछिया हवा की बहती सनसन जहाँ

    करती है मदहोश ठहर कर

    पपीहे की उठती कलोल कलरव जहाँ

    उठाती है विक्षोभ मचल कर

    तमस के गलियारों की चुप्पी जहाँ

    सुनाती है सनसनाहट-सा छन कर

    मुकुर की सुनहरी बिछी चादर जहाँ

    आती है नई उम्मीद बनकर

    जगत की अंतस को दमकाती दोल जहाँ

    निकालती है अमृतद्रव छानकर

    वहाँ पनपते हैं प्रेम

    जो शहर के खुल्लम-खुल्ला संस्कृति से

    होते हैं बिलकुल अलग

    जहाँ अभिव्यक्ति के लिए

    इज़हार आवश्यक नहीं

    वहाँ प्रेमसिद्धि के लिए

    किसी मॉल के चक्कर

    नहीं लगाने पड़ते

    ही वहाँ प्रेम के प्रमाण के लिए

    सर्टिफ़िकेट देने पड़ते

    पब, डिस्को

    ख़र्चने होते हैं सबकुछ

    एक पागल आशिक के मानिंद

    उन्हें तो प्रेम है

    प्रेमी के परछाई से

    जो उसके चले जाने के बाद

    पड़ी है हर एक शून्य स्थान पर,

    वह बनाबटी दुनिया से है अंजान

    वहाँ प्रेम है निशा की टपकती

    ओस में

    जो स्वर्ण कण-सा बिखरे रहते हैं

    प्रभात बेला में

    उन्हें इंतज़ार रहता है

    अपने प्रेमी का

    जो नंगे पाँव आकर

    समेट लेंगे उन्हें

    भर लेंगे आग़ोश में

    बिन स्पर्श किए।

    स्रोत :
    • रचनाकार : कुमार विक्रमादित्य
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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