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समय की धार…

samay ki dhaar…

नीतू गुजराल

नीतू गुजराल

समय की धार…

नीतू गुजराल

और अधिकनीतू गुजराल

    समय की धार को समझने बैठी हूँ आज

    ये बिंदु है एक, जो रेखा में बदल के धीरे-धीरे चलता है

    खींचता है हल्के-हल्के पहले, फिर किसी झटके किसी अड़चन पे भी थमता नहीं,

    हर धागे, हर दामन को झपट के खींच ले जाता है कहीं और

    खोने के एहसास से बहुत पहले...

    बिना आहट का मेहमान है ये, घर के हर कोने पे इसकी छाया है

    धीरे-धीरे अपना बनता है, मोह के धागों की उलझनों का लिबास लिए

    अपनी पोटली को भरता है मेरे मन के सामान से, मेरे एहसासों की मलकियत से,

    बिना ये ब्यौरा दिए कि क्या क्या ले जा रहा है हर दिन,

    और चला जाता है कहीं और,

    खोने के एहसास से बहुत पहले...

    चलते हुए तो दिखता नहीं कभी, परछाइओं में ढला फिरता है

    खिल-खिलाते चेहरों को तस्वीरों में बदल, गीतों को कीरने करता है

    धुँधलाती यादों और लकीरों को, भूले बिसरे किस्सों में दफ़न करता है,

    और ले जाता है बची राख कहीं और,

    खोने के एहसास से बहुत पहले...

    दुःख और उसका एहसास जाता तो नहीं कहीं,

    हाँ, समय हर दिन अपनी नयी परत से सजाता ज़रूर है मन को, चाह के भी कुछ फ़ना नहीं होता,

    दबता है लकीरों की परतों में दिन दिन, पर कहीं मन का रुदन भी दफ़न होता है

    हर अलविदा को ले जाता है कहीं और,

    खोने के एहसास से बहुत पहले...

    फिर हम चले फिरतें हैं यादों के समंदर में, हसरतों के वीराने लिए

    फूलों की चुभन, चाँद की जलन और सुखों की टीस लिए,

    किसी गीत, किसी नाम, किसी रंग के छुए के आँसू लिए,

    अपने टूटे हुए सपनों के दिए फिर से जलाने के लिए,

    हर लौ को ले जाता है कहीं और,

    खोने के एहसास से बहुत पहले...

    और हम बेहिस्स इस एहसास में चले चलते हैं

    कि मन भी मेरा और मन कि कहानियाँ भी मेरी

    अँधेरा रोशनी अनुभव सुख दुःख,

    एक तिनका भी नहीं मेरा

    मैं भी नहीं...

    हूँ बस समय का पहरेदार, साँसों की डोर के खिंचने तक

    उसे भी ले जाता है ये, समय, कहीं और,

    खोने के एहसास से बहुत पहले...

    स्रोत :
    • रचनाकार : नीतू गुजराल
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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