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क़वाफ़ी को पढ़ते हुए

qavafi ko paDhte hue

अनुवाद : गिरधर राठी

यूजीनियों मोंताले

अन्य

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यूजीनियों मोंताले

क़वाफ़ी को पढ़ते हुए

यूजीनियों मोंताले

और अधिकयूजीनियों मोंताले

    जबकि नीरो बेख़बर सोया है

    छुटपुट गृहदेवता भाग खड़े होते हैं—

    रणचंडियों की आवाज़ सुनते ही।

    अब और कैसे जागेगा वह अब?

    कवि ने कहा : मैं, जो किसी का—

    ख़ुद अपना भी—शाह नहीं,

    जिसके पास चंदन की आँच नहीं,

    ठिठरता मरियल अलाव है क़रीब,

    मैं भी सुन रहा हूँ

    खुरों और बूटों की बारीक आहट

    मैं जागता नहीं, एक अरसे से बैठा हूँ

    जगा हुआ,

    और जो देख चुका उनके अलावा

    नए किसी ख़ौफ़ का अर्दली से कह दूँ—

    काट दो मेरी शिराएँ

    किसी भी चीज़ से हैरत नहीं होती।

    चूहे की खटर-पटर सुन ली है

    और मैंने

    कभी चूहेदानियाँ नहीं लीं।

    स्रोत :
    • पुस्तक : दरवाज़े में कोई चाबी नहीं (पृष्ठ 277)
    • संपादक : वंशी माहेश्वरी
    • रचनाकार : यूजीनियों मोंताले
    • प्रकाशन : संभावना प्रकाशन
    • संस्करण : 2020

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