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एकवारी

ekvari

संतोष सिंह

संतोष सिंह

एकवारी

संतोष सिंह

और अधिकसंतोष सिंह

    सोन के पार सहार से थोड़ी दूर

    भोजपुर जिले में है एक गाँव एकवारी

    कहते हैं चलती थीं यहां बस गोलियाँ

    बंद रहते थे स्कूल महीनों के महीनों

    एक ही बात होती थी

    किस तरफ़ से कितना मरा

    कोई खेत जोतते मारा जाता

    कोई फसल कटाई के वक्त

    कोई घर में सोते वक्त

    बच्चे, बूढ़े, नवविवाहिता, गर्भवती औरतें

    सब एक समान होते थे बंदूकों के निशाने पर

    आख़िर, बंदूकों के निशाने होते हैं

    आँखें नहीं।

    ये उस बिहार की बात है

    जब एक नारा दिया गया

    सोना बेचो, लोहा ख़रीदो

    फिर ख़रीदी जाती थीं लोहे की बंदूकें

    यह जाति युद्ध का लाल दौर था

    लंबे शोषण और उत्पीड़न

    सामंतवाद से उपजा वर्ग संघर्ष

    ख़ूनी क्रांति में तब्दील हो गया था

    शाहाबाद और मगध ने झेला

    सबसे अधिक दंश जाति युद्ध का

    समाजवाद का नारा देने वाली ज़मीन

    अपना उसूल भूल गई थी।

    जगदीश मास्टर का क्या जुर्म था

    उसी एकवारी का था वह पढ़ा-लिखा नौजवान

    जो वोट देना चाहता था

    अपने मातहत समाज को जागरूक करने में लगा था

    दबंगई और अधिकार में ठन गई

    मालिक और काश्तकार भिड़ गए

    खेतों में धान के बदले

    बोए जाने लगे इंसानों के सर

    फिर बरसों तक ज़मीन

    उगलती रही ख़ून और विद्वेष।

    एकवारी अब भी शोकाकुल लगता है

    एक तरफ कुर्की-जब्ती की याद दिलाते

    टूटे छज्जे वाले अगड़ों के पक्के मकान

    दूसरी तरफ़ ख़ूनी संघर्ष की दास्ताँ बयाँ करते

    जगदीश मास्टर का गुमनाम स्मारक

    कुछ घरों की दीवारों पर गोलियों के दाग

    अब भी हैं

    इस वर्ग संघर्ष का क्या हासिल था

    सुखिया पासवान मरा हो या संग्राम सिंह

    लहू का क्या हासिल था।

    स्रोत :
    • रचनाकार : संतोष सिंह
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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