एकाकी और चाँद तले मद्यपान
ekaki aur chaand tale madyapan
फूलों के बीच मैं
अकेला हूँ अपने मद्यपात्र के साथ
आप ही पीता, फिर उठाता
अपना प्याला और पूछता चाँद को
साथ पीने के लिए, उसका बिंब
और मेरा प्याले में, बस
हम तीन, फिर मैं आह भरता
चाँद के साथ न पी सकने के लिए,
और मेरी परछाई बस
मेरे साथ, बिना एक भी शब्द बोलती।
यहाँ और कोई साथी नहीं, मैं
आनंद के समय इन दोनों की संगत में,
मुझे भी उस सबसे ख़ुश होना चाहिए
जो मेरे चार ओर है।
बैठा मैं गाता हूँ और लगता है कि चाँद
मेरे साथ है; फिर मैं नाचूँ तो,
मेरी यह परछाई होगी जो मेरे साथ नाचेगी।
फिर बिना पिए भी
मैं ख़ुश हूँ कि मेरी परछाई और चाँद
मेरे दोस्त हैं; लेकिन फिर जब
मैं ज़्यादा पी लेता हूँ,
विलग हो जाते हैं हम।
फिर भी ये दो साथी जिन्हें मैं सदा गिन सकूँगा,
ये जो निर्भाव हैं।
ख़ैर, मैं आशा करता हूँ कि
हम तीन फिर मिलेंगे,
गहरी आकाशगंगा में।
- पुस्तक : सदानीरा पत्रिका
- संपादक : अविनाश मिश्र
- रचनाकार : लि पो
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