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एक दिन

ek din

विभूति तिवारी

और अधिकविभूति तिवारी

    आए बाए कान कटाए 

    लोखरी का गमन कराए... झुर्र 

    और हम दोनों हो जाते फुर्र 

    अब सोचती हूँ तो बचपन का यह खेल 

    जीवन के खेल का रिहर्सल लगता है  

    एक-एक कर सब फुर्रर्रर्र होते चले गए 

    फुर्रर्रर्र होना और एक दिन 

    फ़ना हो जाना ही नियति है 

    जितनी गहरी होती जाती है यह प्रतीति 

    उतनी ही शिद्दत से याद आता है यह खेल 

    भाई के साथ दोनों हाथों से 

    पकड़कर एक-दूसरे के कान 

    बारी-बारी से बार-बार 

    अपनी-अपनी ओर खींचते हुए 

    सस्वर गाते थे यह सधा हुआ गान 

    आए बाए कान कटाए 

    लोखरी का गमन कराए 

    फिर एकाएक बोलकर 'झुर्र' 

    हो जाते थे फुर्र 

    अक्सर दुखती रहती थीं 

    देर तक कानों की बालियाँ 

    ऊपर से बरसती थीं माँ की गालियाँ 

    लेकिन रुका नहीं कभी खेल 

    लड़ते-झगड़ते हुए भी 

    मन ही कभी हुआ बेमेल 

    खेल-खेल में हम तुम बड़े हो गए 

    ज़िंदगी की रेस में खड़े हो गए 

    भोली-सी सुबह की छँटती गई लाली 

    सुख-दुख के किनारों बीच 

    सरकती रही जीवन की गाड़ी 

    दुनियादारी में पड़े तो समझ आया 

    कच्चे और पक्के रिश्तों का फ़र्क़ 

    और हाँ! कान भी तो होते हैं 

    कच्चे और पक्के 

    होते हैं कान के जो कच्चे 

    उनके रिश्ते 

    कभी नहीं होते हैं पक्के।

    स्रोत :
    • रचनाकार : विभूति तिवारी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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