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एक दिन घर

ek din ghar

दीप्ति कुशवाह

दीप्ति कुशवाह

एक दिन घर

दीप्ति कुशवाह

और अधिकदीप्ति कुशवाह

    (एक)

    कौन है

    वह समय

    जब ताले चेहरों से पहचान करेंगे

    आवाज़ों को तौलेंगे

    आँखों की पुतलियों से अनुमति ले लेंगे

    लौटते हुए लोगों को

    जेबों में रखी चाबियों की तरह

    अपनी थकान भी साथ नहीं ढोनी पड़ेगी

    दरवाज़े किसी गुप्त गणित के इशारे पर

    खुलेंगे और बंद होंगे

    जैसे घर नहीं

    कोई निराकार चेतना हो

    इतना जानकार हो जाएगा घर

    कि ये शब्द विलुप्त हो जाएँगे

    कौन है

    ‘अंदर आइए’ भी सुनाई नहीं देगा

    धीरे-धीरे पृथ्वी से चली जाएगी वह ध्वनि

    जो उँगलियों के पोरों और लकड़ी या लोहे के बीच

    एक छोटे से पक्षी की तरह जन्म लेती थी

    कौन जानेगा, कभी

    एक सख़्त सतह पर

    बस इतनी-सी थाप पर्याप्त होती थी

    कि कमरे में खड़ी स्त्री

    अखबार में झुका पुरुष

    होमवर्क में जुटा बच्चा

    अपने-अपने कामों से सिर उठाकर

    दुनिया के प्रति थोड़ा अधिक सजग हो जाते थे

    भविष्य के घरों में सब प्रवेश कर सकेंगे

    केवल दस्तक नहीं।

    (दो)

    आगमन से पहले

    भविष्य के घरों में

    प्रतीक्षा की कोई उपयोगिता नहीं बचेगी

    हर व्यक्ति की स्थिति हर क्षण ज्ञात रहेगी

    कौन कहाँ है, किस गति से चल रहा है

    कितनी देर में पहुँचेगा

    इन सबका लेखा

    दीवारों के भीतर बहती हुई

    अगोचर संख्याएँ रख लेंगी

    तब किसी खिड़की को

    सड़क की ओर खुलने की आवश्यकता नहीं होगी

    किसी बालकनी को

    दूर तक देखने का अभ्यास नहीं करना पड़ेगा

    साँझ किसी की वापसी की दिशा में

    झुककर खड़ी नहीं होगी

    और न ही रात

    किसी विलंबित पदचाप की आहट सुनने के लिए

    अपनी नींद टालेगी

    तब मनुष्य एक-दूसरे के बारे में

    इतना कुछ जानते होंगे

    कि चिंता के लिए

    बहुत कम स्थान बचेगा

    और शायद प्रेम के लिए भी

    क्योंकि प्रेम का एक पुराना रूप

    किसी के आने के समय से अधिक देर तक

    जगे रहने में बसता था

    कोई घड़ी बार-बार नहीं देखेगा

    कोई हवा के हल्के कंपन को

    कदमों का भ्रम नहीं समझेगा

    सब लोग लौट आएँगे तय घड़ी

    और लौटने से पहले ही

    उनके पहुँच जाने की सूचना मिल चुकी होगी

    केवल प्रतीक्षा

    अपने नियत स्थान पर अकेली खड़ी रह जाएगी।

    (तीन)

    छाया का निवास

    प्रकाश इतना परिपूर्ण हो जाएगा

    कि रात को

    अपने पुराने कामों से मुक्त कर दिया जाएगा

    कोई कोना दृष्टि से बाहर नहीं रहेगा

    कोई सीढ़ी अनुमान के भरोसे नहीं चढ़ी जाएगी

    कोई चेहरा आधे उजाले में नहीं बचेगा

    घर लगातार जगमग रहेंगे

    जैसे उन्हें

    किसी अप्रकट निरीक्षण से गुजरना हो

    तब अँधेरा

    अपने लिए एक छोटा-सा कमरा खोजेगा

    जहाँ वह कुछ सपनों को छिपा सके

    कुछ भय पाल सके

    कुछ रहस्यों को जीवित रख सके

    मनुष्य सब कुछ देख सकने की

    अपनी क्षमता में निश्चिंत होता जाएगा

    बिना यह जाने कि उसने खो दी है वह जगह

    जहाँ कल्पनाएँ आँखें खोलती थीं।

    (चार)

    धरती का स्पर्श

    एक दिन

    जूतों के तलवों से चिपकी हुई मिट्टी

    घरों से निर्वासित कर दी जाएगी

    पैरों के साथ थोड़ी सी धरती भीतर आना चाहेगी

    पर हर बार एक अदृश्य चौकसी उसे रोक देगी

    फर्श इतने निर्मल होंगे

    कि उन पर अतिथि का कोई निशान नहीं ठहरेगा

    फर्श इतना स्वच्छ

    कि किसी बच्चे की उँगली

    उस पर अपना पहला वृत्त नहीं बना सकेगी

    मिट्टी को सहेजा जाएगा

    काँच के बक्सों में

    जैसे संरक्षित किए जाते हैं विलुप्त प्राणियों के अवशेष

    उस समय की स्मृति में

    जब मनुष्य अपने घरों को साफ रखने से अधिक

    उन्हें जीवित रखने की चिंता करता था।

    (पाँच)

    एक विराम की मृत्यु

    घर की हर सतह बोलने लगेगी

    तस्वीरें सूचनाएँ देंगी

    दर्पण सलाह देंगे

    मेजें स्मरण कराएँगी

    और छतों के भीतर असंख्य कूट संवाद

    लगातार चलते रहेंगे

    तब मौन

    घर की भाषा में

    एक त्रुटि की तरह दिखाई देगा

    यदि कहीं कुछ देर तक

    कोई ध्वनि नहीं होगी

    तो घर पूछेगा, सब ठीक है?

    क्या सहायता चाहिए?

    कोई समस्या है?

    और धीरे-धीरे मनुष्य

    मौन को सुनने के बजाय

    उसका कारण खोजने लगेंगे

    घर का कोई सदस्य चुप होगा

    उसकी चुप्पी समझी नहीं जाएगी

    ठीक की जाएगी।

    (छह)

    संयोग के लिए जगह

    सभ्यता ने जब अपनी सभी गणनाएँ पूरी कर लीं

    तो पाया

    कि एक कुर्सी हमेशा बच जाती है

    जिसका कोई निर्धारित उपयोग नहीं

    वहीं बैठते थे आगंतुक

    और कई बार संयोग भी

    इस अतिरिक्तता को हटा दिया जाएगा

    नई शताब्दियों के वास्तुकार

    स्थान को उतनी ही सावधानी से नापेंगे

    जितनी सावधानी से घड़ियाँ समय को नापती हैं

    एक शरीर के लिए एक आसन

    एक जीवन के लिए एक कमरा

    और आवश्यकताओं से अधिक कुछ नहीं

    तब लोग मिले बिना दूर नहीं रहेंगे

    और विदा कहे बिना

    अलग हो जाया करेंगे

    घरों में कोई ऐसी जगह नहीं बचेगी

    जहाँ कोई अपरिचित

    आसानी से अपना परिचय रख सके

    दक्षता के उस उज्ज्वल युग में

    एक खाली कुर्सी

    नक्शे की सबसे पहली कटौती होगी

    और संयोग

    सबसे पहले बेघर होगा।

    (सात)

    ऋतुओं की ख़बर

    ऋतुओं का घरों से संबंध

    धीरे-धीरे इतना कम हो जाएगा

    कि बादल केवल शीशों के बाहर घटेंगे

    घरों का भीतर और बाहर

    लगभग एक-सा रखा जाएगा

    न तपन को प्रवेश मिलेगा

    न ठिठुरन को

    ऋतुएँ आती रहेंगी

    जंगलों के कंधों को छू कर

    घास के रंग उलटती-पलटतीं

    पहाड़ों के रंग बदलती हुईं

    लेकिन घरों तक पहुँचते-पहुँचते

    उनकी सारी उग्रता और कोमलता छँट जाएगी

    आकाश भरा हुआ होगा जल से

    पर लोगों की त्वचा तक

    उसका कोई समाचार नहीं पहुँचेगा

    बाहर का संसार

    अपने किसी नए चरम पर होगा

    पर कमरों में स्थिरता का राज होगा

    धीरे-धीरे ऋतुएँ अनुभव से निकलकर

    सूचना में बदल जाएँगी।

    (आठ)

    याद से बाहर

    वस्तुएँ अपने बनने के क्षण से ही

    अपने प्रतिस्थापन की प्रतीक्षा कर रही होंगी

    उनके भीतर

    दीर्घायु होने का कोई स्वप्न नहीं बचेगा

    वे उपयोग में आएँगी

    चमकेंगी

    अपना कार्य पूरा करेंगी

    और पुरानी पड़ने का अवसर नहीं पाएँगी

    घरों में कुछ भी ऐसा नहीं होगा

    जिसकी सतह पर समय ने अपनी उँगलियाँ फेरी हों

    किसी रेलिंग की साँस पर

    किसी बर्तन की देह पर

    किसी हत्थे की नाक पर

    वर्षों का स्पर्श जमा नहीं होगा

    फिर शायद किसी दिन

    किसी अत्यंत नवीन वस्तु की चमक में

    अचानक उतर आएगी एक उदासी

    मनुष्य ठिठककर देखेगा

    उस निर्दोष चमक को

    और उसकी आँखों में भर आएगा एक ऐसा शोक

    जिसका कोई इतिहास नहीं होगा।

    स्रोत :
    • रचनाकार : दीप्ति कुशवाह
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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