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एक भिक्षु को खोजना और न पाना

ek bhikshu ko khojna aur na pana

अनुवाद : योगेंद्र गौतम

लि पो

लि पो

एक भिक्षु को खोजना और न पाना

लि पो

और अधिकलि पो

    मैंने, घाटी को जाता

    एक छोटा मार्ग लिया,

    वहाँ एक मंदिर पाया,

    जिसका द्वार, काई से ढका था

    द्वार के सामने चिडियों के निशान थे;

    बूढ़े भिक्षु के कक्ष में

    कोई नहीं रह रहा था, मैंने

    खिड़की से बाहर देखते हुए

    एक बाल झाड़ने की कूँची को

    दीवार से लटके हुए देखा, जो ख़ुद भी

    धूल से ढकी थी, एक रिक्तता से आह भरकर

    मैंने जाने का सोचा, लेकिन तभी

    पलटते हुए मुझे दिखा

    कैसे पहाड़ियों पर बर्फ़ उड़ रही थी,

    और तभी हल्की-सी बारिश हुई, मानो

    आकाश से फूल बरस रहे हों—

    अपना ही संगीत रचते हुए;

    अचानक दूर से एक बंदर की किलकारी

    आती है, और दुनिया की परवाह मुझसे

    छिटक जाती है;

    मैं अपने चारों ओर की

    ख़ूबसूरती से भर जाता हूँ—उसी पल।

    स्रोत :
    • पुस्तक : सदानीरा पत्रिका
    • संपादक : अविनाश मिश्र
    • रचनाकार : लि पो

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