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दुःख

duःkha

अंकित कुमार

और अधिकअंकित कुमार

    कविता का घर उजालों में नहीं बसता

    वह उन कोनों में रहती है

    जहाँ कोई चुपचाप अपने ही भीतर टूट रहा होता है

    हर मार्मिक कविता के पीछे किसी अनकहे दुःख की परछाईं होती है

    किसी बिछड़न की धूल, किसी अधूरी इच्छा की राख

    लोग पूछते हैं, कविता का क्या काम इस तेज़ रफ़्तार दुनिया में?

    जहाँ मशीनें पल भर में उत्तर देती हैं

    जहाँ आँकड़े भावनाओं से अधिक विश्वसनीय माने जाते हैं

    वे कविता को देखते हैं जैसे किसी पुराने मकान को

    जो शहर के नक्शे में अब अनावश्यक घोषित हो चुका हो

    फिर भी,

    जब रात बहुत गहरी हो जाती है

    और सारे तर्क थक हारकर सो जाते हैं

    मन उसी दरवाज़े पर लौटता है

    जहाँ कुछ शब्द धीमे से उसका हाथ थाम लेते हैं।

    शायद इसी कारण कविता अभी तक जीवित है

    क्योंकि मनुष्य के भीतर जब तलक दुःख जीवित है

    और इस संसार में जब तक दुःख रहेगा

    कोई कोई एक पंक्ति लिखता रहेगा अँधेरे के विरुद्ध।

    स्रोत :
    • रचनाकार : अंकित कुमार
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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