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धरती पानी-पानी माँगे ना

dharti pani pani mange na

मनोज मिश्र ‘कप्तान'

मनोज मिश्र ‘कप्तान'

धरती पानी-पानी माँगे ना

मनोज मिश्र ‘कप्तान'

और अधिकमनोज मिश्र ‘कप्तान'

    बदरा बूँद लावै, दैवय दुआ किसानी माँगै,

    धरती पानी-पानी माँगे, ना

    जो किसान कै जिउ परान ऊ, कुलि खेती मुरझानी।

    बोरिंग से अब बात बनय ना, चौपट भई किसानी।

    घर पर बँधा जानवर भूखा, नादा-सानी माँगे,

    धरती पानी-पानी माँगे ना

    इंद्रदेव के पूजा होइ गय, मनिगै कइव मनौती।

    अंतिम अस्त्र चलाइन लड़िके, खेलिन काल कलौटी।

    कैसी विडम्बना है, भिच्छा प्रभु से, दानी माँगै,

    धरती पानी-पानी माँगे ना

    चटकी धरती, अटकीं साँसें, का बोवय, का काटय,

    हरा खेत भा परती, धरती केर करेजा फाटय,

    जल्दी कुसल छेम, ना उनकै राजधानी, माँगै

    धरती पानी-पानी माँगे ना

    अबहीं तौ लागत है खेती, बूँद-बूँद का तरसी,

    झरसी खेती, तब हरषी जब, झमकि कै मघ्घा बरसी।

    सासन मुआवजा मा, सूखा केर निशानी माँगे

    धरती पानी-पानी माँगे, ना

    स्रोत :
    • पुस्तक : अवधी मिठास (पृष्ठ 59)
    • रचनाकार : मनोज मिश्र ‘कप्तान’
    • प्रकाशन : सर्वभाषा प्रकाशन, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2025

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