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दो परिंदों की बातचीत

do parindon ki batachit

अनुवाद : सुरेश सलिल

माओ ज़ेडॉन्ग

माओ ज़ेडॉन्ग

दो परिंदों की बातचीत

माओ ज़ेडॉन्ग

और अधिकमाओ ज़ेडॉन्ग

     

    ख़ुनफङ के फैले हुए पंख1

    जैसे कि पंखे,

    आसमान में नब्बे हज़ार ली की ऊँचाई तय करता

    उठाता हुआ एक पुरज़ोर ज़लज़ला

    पीठ पर सँभाले हुए नीला आसमान

    फेरता है वह अपनी दृष्टि नीचे की ओर 

    ताकि ले सके जायज़ा आदमी की बनाई दुनिया का; 

    उस दुनिया का, जिसमें शहर हैं; क़स्बे हैं।

    बंदूक़ों से लपकती हुई लपट 

    चाटती है आसमानी ऊँचाइयाँ 

    और तोपों के गोले 

    खोदते हैं ज़मीन में गढ़े।

    झाड़ी के बीच दुबकी 

    बेहद डरी हुई 

    एक गौरैया कहती है : 

    ओ! यहाँ तो है मुसीबतों का दलदल! 

    चाहती हूँ उड़ जाऊँ दूऊऊऊर 

    यहाँ से बचकर।

     

    कहाँ? ज़रा मैं भी तो जानूँ! 

    परियों के देश में। पहाड़ियों की गोद में 

    खड़े हैं जो हीरे-जवाहरात जड़े महल दुमहले; 

    चाहती हूँ वहीं मैं जल्दी से उड़ जाना। 

    उत्तर देती है गौरैया, 

    पता नहीं है तुम्हें, दो साल पहले 

    शरद की चटख़ चाँदनी में 

    दस्तख़त हुए थे एक त्रिपक्षी समझौते के मसौदे2 पर? 

    ढेर सारी चीज़ें वहाँ होंगी खाने को—

    गरमागरम आलू और 

    मांस का गुलाश3 , भरवाँ पकवान...

    बंद करो अपनी यह शेख़चिल्लियाना बकवास! 

    देखती नहीं हो क्या, कि दुनिया को 

    सिर के बल खड़ा किए दे रहे हैं वे?

    स्रोत :
    • पुस्तक : रोशनी की खिड़कियाँ (पृष्ठ 123)
    • रचनाकार : माओ ज़ेडॉन्ग
    • प्रकाशन : मेधा बुक्स
    • संस्करण : 2023

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