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धावऽ...धावऽ...बबुआ बेपेनी...

dhaavऽ. . . dhaavऽ. . . babua bepeni. . .

प्रकाश उदय

प्रकाश उदय

धावऽ...धावऽ...बबुआ बेपेनी...

प्रकाश उदय

और अधिकप्रकाश उदय

    खाली खिया देब नीके तरी पाँच सै बरियात

    हमरा दहेज के नइखे कवनो ताप

    कहले बबुआ के बाप।

    कहले चाचा जी कि जा जी

    हम खाली

    एगो अठसेरही भँइस राजी।

    तब फुरमवले दुलहा के भइया

    जोड़ा बैल ऊपर बीस हजार रुपइया।

    दुलहा कहले कि कुछो ना

    खाली एगो मोटर सैकिल

    सहबाला के कहनाम कि ऊहो ना

    खाली एगो बै सैकिल।

    जनानी कीता से आइल कहावा

    सोरहो सभाखन, बतीसो अभरन

    सँउसे पहिरावा

    जवन रावा सवख सरधा

    सेकरा अलावा।

    सभका के बाद में

    कूँख के काँख के

    खाँस के खंखार के

    कहले अस्थिराह से

    दुलहा के आजा

    कि हे अगुआ बाचा

    हमरा के दिवा दीहऽ

    चानी के गुड़गूड़ी

    एके से काम चला लेब

    हम, हमार बूढ़ी।

    अगुआ जी लेले पाइए-पाई करार

    बलुक अपना देने से

    बढ़िए चढ़ के दस-पाँच हाथ।

    हप्ता चाभते रह गइले

    ततले-ततले तर माल

    दही-पापड़-घीव-अँचार!

    अठवाँ दिने, होत पराते

    तीन सेर के फुलहा लोटा उठवले

    मर-मैदान के बहाने बहरिअइले

    फेरु राम जनकपुर ना अइले

    तिकवते रह गइले—आजा बाबू चाचा भइया गोतिया नइया!

    खाए पिए से बाँचल

    नइहर के एके निसानी

    नीसन लोटा—

    छाती मूक मार गिरली बबुआ के माई!

    तीन सेर के लोटा रहे बाछी—

    तेरह खेंढ़ी उपरे से ढिमिला गइली चाची!

    माथे हाथ हाथे गाल दे के

    कहली भउजाई कि हाइ-रे-हाई

    नतिया खाती भुँजिया चीरत-चीरत

    अँगुरी पिरा गइल

    निहतनिया के देखऽ भला

    पानी सहिते लोटा ले के परा गइल!

    बड़ा मउगाह रहे

    हमरा देने देख के

    कनखिए के भरे मुस्कियात रहे

    हमरा तखनिए कुछ अड़गुड़ बुझात रहे!

    उठवले उठत ना रहे जवन लोटा

    तवना के ले भागल अगुअवा निगोड़ा

    —कहली बबुआ के आजी—

    बइया-समवना इमदी रहे कि हाथी!

    हाथी?!

    आहि,

    हाथी अगुअवा से मँगइबे ना कइल

    धाव ऽ...धाव ऽ...बबुआ बेपेनी...

    दस कोस से अधिका ना होई गइल!

    स्रोत :
    • पुस्तक : बेटी मरे त मरे कुँआर [भोजपुरी कविता-संग्रह] (पृष्ठ 6)
    • रचनाकार : प्रकाश उदय
    • प्रकाशन : कौशल्या प्रकाशन, आरा
    • संस्करण : 1988

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