देवी बनने की राह में
लंबा सफ़र तय किया
हमने
कई भूमिकाएँ बदली
आँसू की बूंदों का स्वाद चखा
ख़ून बहाया
कटा चीरा ख़ुद को
अपमान के साथ
झेली कई यातनाएँ
हमने छोड़ा अपना घर
पुराने खिलौने
अपनी प्रिय सखी
अपना शहर
हमने मारा अपने सपनों
और छोटी-छोटी आशाओं को
नहीं देखा कभी खुलकर
शहर को
नहीं जान पाए हम
ख़ुद की मर्ज़ी से जीना
कैसा होता है
रात में सड़कों पर चलता हुआ
शहर कैसा दिखता है
वह जगह कैसी होती है
जहाँ पर केवल देव जा सकते है
कैसे होते हैं वो
स्थान जहाँ पर अजनबी चलते है
नहीं पता हमें कैसे दिखती हैं
उसकी ज़मीन और आसमान
हमने नहीं तोड़ी वह दीवारें
जो हमें रोकती थी
बल्कि बनाए घर
सजाया घर घरौंदा
मिट्टी से लिपा
चूल्हा चौका
पकाएँ ख़ूब पकवान
हमने अपनी ख़ुशियों को
दरकिनार कर
दुःख में निभाया देवी धर्म
हमने जानना छोड़ दिया
हमें क्या पसंद है
हम बस चलते गए
और सीखते देखे गए
अच्छी देवी बनने का सबक
हमने मंदिरों में दिए जलाए
तीज, व्रत और त्योहार किए
हमने पीपल के पेड़ पर बंधे
मनोकामनाएँ के धागे
नदी से
पर्वत से
चाँद से
पेड़ से
भगवान से
देव लोक के अमरत्व की
प्राथनाएँ
हमने वो गीत गए
जो देव लोक को
प्रिय थे
हमने सजाया ख़ुद को
लगाया महावर अपने पैरों में
पहनी लाल हरी चूड़ियाँ
तब तक
जब तक हम देवों के साथ थे
हमने टल दी लड़ाई
किए बहुत से समझौते
ताकि हमारा देवत्व
हमसे न रूठे
हमने देखा कि
यह सब भी कम पड़ा
ख़ुद को देवी
साबित करने को
- रचनाकार : मुक्ति प्रिया
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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