Font by Mehr Nastaliq Web

भिक्षुक

bhikshuk

वह आता—

दो टूक कलेजे को करता, पछताता

पथ पर आता।

पेट-पीठ दोनों मिलकर हैं एक,

चल रहा लकुटिया टेक,

मुट्ठी भर दाने को—भूख मिटाने को

मुँह फटी पुरानी झोली का फैलाता—

दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।

साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाए,

बाएँ से वे मलते हुए पेट को चलते,

और दाहिना दया दृष्टि-पाने की ओर बढ़ाए।

भूख से सूख ओंठ जब जाते

दाता—भाग्य-विधाता से क्या पाते?—

घूँट आँसुओं के पीकर रह जाते।

चाट रहे जूठी पत्तल वे सभी सड़क पर खड़े हुए,

और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए!

स्रोत :
  • पुस्तक : निराला रचनावली (भाग-1) (पृष्ठ 65)
  • संपादक : नंदकिशोर नवल
  • रचनाकार : सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
  • प्रकाशन : राजकमल प्रकाशन
  • संस्करण : 1983

Additional information available

Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

OKAY

About this sher

Close

rare Unpublished content

This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

OKAY