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दहेज

dahej

सरकार दहेज लेब' देब' वला के

'ऐरेस्ट' करत

मुदा जखन मिआँ-बीबी राजी हो

तँ सरकारी काजी ककरा 'ऐरेस्ट' करत?

मधुबनी सँ सटले उत्तर सौराठ सभा मे

ताल ठोकैत

दहेज रूपी राक्षस केँ परास्त करबा लेल

जत' बर-रूपी पोसुआ बच्छा करए छह-छह

कन्यागत करय सह-सह

बाछाक दाम बीस-तीस लाखो सँ उपर हो

जत' क्रेता

बिक्रेता एक दोसरा पर

बको ध्यान लगौने हो

तत' जँ सी.आइ.डी.

एन्टीकरप्शन

हुलकाओल जायत

तँ एहि सँ होयत दूइए टा बात,

सौराठ सभा टूटि क'

घर-घर मे मेला लगनाइ शुरू भ' जाएत

सामानक दाम ऊन सँ दून भ' जाएत

टल्हो चानीक भाव बिकत,

जँ

अफसरक पैर पर,

डाली रूपी 'शेयर' टपकि गेल

तँ अफसर त'र सँ आँखि मारि

चुपे अँगाक तिजोरी मे

राखि देबाक लेल इशारा करत

किएक तँ

एतेक मूर्ख नहि जे

हाथक आयल लक्ष्मी के लौटा देत,

तखन,?

सौराठ सभाक मैदानहि मे

कन्यागत चुकरि क'

टाकाक पुलिंदा उझलत

बरागत रावण जकाँ

'हा-हा' करैत टाका उठाओत

कन्यागत बरागतक धोधहा पेट केँ

शालीग्राम बुझि, दुधढ़रिक बदला टाकाढ़ार करत,

अफसरक सामने अयला पर

ओकर लाज राखय लेल

दिनक इजोत मे डकैती नहि सही

रातुक अन्हरिए मे चोरि चलत

सरकारी नियत तँ

गोलघर जकाँ ठाढ़े रहत

मुदा भितुरका मालक

देखिते-देखिते

गोल-माल भ' जाएत

यदि कन्यागत पूर्व सूचना द'

बरागत् केँ पकड़यबाक चेष्टा करत

जँ बरागत पकड़ाइयो जाएत

तँ रुपैयाक गड्डी-सुँघा

अफसरकेँ मदहोश बना निकसि जायत

मुदा एम्हर,

कन्यागतक नाम सुनिते

बरागत मुँह फेरि लेत

एखन जे कन्यागतक हिचकियो

कान के भान होइत छैक

ओहो ग्रीवे घुमरि क' मरि जाएत

अन्त मे,

कन्यागत-लोकलाज

बेटीके कलंक बुझि

अपन खेत-पथार बेचि

बरक बीबी बनयबा लेल तैयार भ' जाएत

बरागतक पैसाक लिप्सामे

दहेजक ताण्डव नृत्य

अनवरत रूपे चालू रहत

सरकारी नियम डाढ़िए-डाढ़िए चलत

आदमीक धूर्त बुद्धि पाते-पात

निदान मात्र यैह जे

दहेज रूपी महिषासुरक बध करबाक लेल

नारी केँ चण्डी बनि

समर मे कूदय पड़तनि

पुरुष केँ अपन चोकटी आम सदृश सिकुड़ल हृदयके

सूप सन करेजेगी

दानी कर्ण सन प्रशान्त होमय पडतनि।

स्रोत :
  • पुस्तक : झिझिरकोना (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 33)
  • रचनाकार : अशोक कुमार दत्त
  • प्रकाशन : शेखर प्रकाशन, पटना
  • संस्करण : 2017

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