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चौमासु

chaumasu

सत्यधर शुक्ल

और अधिकसत्यधर शुक्ल

    बरि-बरि के लपट बुतानी,

    निज किरनैं सुर्ज समेटिनि

    गरमी ते ऊबे पंछी

    हँसि चौमासे का भेंटिनि।

    अम्बर मा बादर आये

    भुरवा, अधकबरा, करिया,

    लिलबरी, लाल, बसि सबकी

    यकसंघै फुटि डेहरिया।

    म्यढुका टर-टर टर्राने

    क्यचुवन की मची चिंघाटैं

    जलधर प्यासी तलियन का

    रहि-रहि के पानी बाटैं।

    ग्यंगटन के भये जबाना,

    तलबुड़की पूँछ हलाइसि,

    पानी ढिग बैठ बगुलवा

    मछरिन की ताक लगाइसि।

    पी ओस बढ़ाइ जहर का

    सपवा रहि-रहि फुंकारै

    बीछी निज डंक तन्यानै,

    न्यौरा खी खी उच्चारै।

    अपने म्यढुका भैया का

    कछुवा पीठी बैठावै,

    तनिक द्यार के भीतर

    तलिया की सैर करावै।

    कुछु महरि किल्वालै कीन्हिसि,

    क्वैली कू कू कुकिहानी

    तब सोचि-बिचारि सगुन का

    बोली स्यामा मस्तानी।

    पपिहा प्रियतम का टेरिसि

    गाना गौरैया गाइसि

    मोरिनी गगन का देखिसि,

    पखना पुछारि फैलाइसि।

    कटनासु भोरु होतै खन

    घर-घर दरसन दै आवै,

    कौवा 'का का' करि जानै

    का का सन्देसु सुनावै।

    सुरगुटिया बढ़िया सुर मा

    तबला पर ताल लगावैं

    पडुखा ब्यहना दुपच्यचड़ी

    सब खूबै धूम मचावैं।

    बुलबुल चुलबुल बतुवानी

    बूड़ी बहार मा बगिया,

    बसि बढ़िया बरिखा बरसी

    बाँधन पर बाढ़ी बहिया।

    घड़ियाल ज्वाँक नकवा

    ढूढ़ै सब अपनी घातैं

    सुसुवार सीप झींगा सब

    कुछु करैं आपुसी बातैं।

    वहि मछरिन केरि चरौना

    मछरिन के पाछे घूमैं

    कौड़ी झख पनिहा रहि-रहि

    पानी के भितरै झूमैं।

    कहुँ मचा नीर मा हलचल

    कहुँ भारी उठैं हिल्वारैं

    अपने मा पैरावै बदि

    चोबरि-चोबरि तरु त्वारैं।

    वह बाढ़ति जाय छिनौ छिन

    गाँवन के गाँव उजारै,

    बहुतन मनई पसु ब्वारै

    घर-बखरी बने बिगारै।

    जब बाढ़ति-बाढ़ति नद्दी

    बन के नेरे लौं आई,

    पानी ते दुखी जरन मा

    पानी गा खूब समाई।

    बसि घुसै लाग डारन मा

    पलई तक की सुधि लीन्हिसि,

    जब ठौरु मिला बैठै का

    पौढ़ै की झट्टै कीन्हिसि।

    हरियाइ उठे सब बिरवा

    फूटीं कलंगी पत्ता,

    सब गर्द बही उप्पर की

    निकरी देहीं अवबत्ता।

    झूँथी अग्गासु छुवै बदि

    भरि बूत दिनौ दिन उलरैं,

    अग्गासु मिलै बदि आपुइ

    उप्पर ते खाले उतरै।

    जब कबौं हिये मा स्वाँचै

    तब धनुषु तानि ड्यरवावै,

    जब ऊबि जाइ तउ डहुँकै

    करिया गदा द्यखावै।

    चौगिर्दा खुसी बिथरि गै

    चौगिर्दा गूँजै कलरव,

    बरिखा का रुपु बिलोके

    बिसरै बसन्त का बैभव।

    1956 ई.

    स्रोत :
    • पुस्तक : अरघान (पृष्ठ 51)
    • रचनाकार : सत्यधर शुक्ल
    • प्रकाशन : पं. वंशीधर शुक्ल स्मारक एवं साहित्य प्रकाशन समिति, मन्यौरा, लखीमपुर खीरी
    • संस्करण : 2021

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